श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  3.12.88 
प्रभुर नामे मातारे दण्डवत् कैला ।
प्रभुर विनति - स्तुति मातारे कहिला ॥88॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने भगवान चैतन्य महाप्रभु के नाम पर शचीमाता को प्रणाम किया और उन्हें भगवान की सभी विनम्र प्रार्थनाओं से अवगत कराया।
 
He offered his obeisances to Sachimata on behalf of Sri Chaitanya Mahaprabhu and conveyed to her all the requests and prayers of Lord Chaitanya Mahaprabhu.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)