श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  3.12.83 
निज - कृपा - गुणे प्रभु बान्धिला सबारे ।
महाप्रभुर कृपा - ऋण के शोधिते पारे ? ॥83॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने अपनी दिव्य कृपा से सबको बाँध रखा है। श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा का ऋण कौन चुका सकता है?
 
Mahaprabhu has bound everyone with his divine grace. Who can repay this debt of Sri Chaitanya Mahaprabhu's grace?
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas