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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  3.12.60 
प्रश्रय - पागल शुद्ध - वैदग्धी ना जाने ।
अन्तरे सुखी हैला प्रभु तार सेइ गुणे ॥60॥
 
 
अनुवाद
घनिष्ठ संबंध कभी-कभी व्यक्ति को औपचारिक शिष्टाचार का अतिक्रमण करने पर मजबूर कर देते हैं। इस प्रकार परमेश्वर ने अपने सरल और स्नेहपूर्ण व्यवहार से वास्तव में भगवान को अपने हृदय में प्रसन्न कर लिया।
 
Intimacy sometimes leads to violations of common etiquette. Therefore, through His simple and loving behavior, the Supreme Lord truly brought joy to Mahaprabhu's heart.
तात्पर्य
प्रश्रय का अर्थ है स्नेह, नम्रता, विश्वास, किसी खास रियायत की मांग, या ऐसी रियायत में लिप्त होना। पागल का अर्थ है ढिठाई, अहंकार और प्रभाव। वैदग्धी का अर्थ है चालाकी, हास्य, सुंदरता, विशेषज्ञता, शिक्षा, पेचीदा व्यवहार और संकेत।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)