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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  3.12.59 
मुकुन्दार मातार नाम शुनि’ प्रभु सङ्कोच हैला ।
तथापि ताहार प्रीते किछु ना बलिला ॥59॥
 
 
अनुवाद
मुकुन्दरा माता का नाम सुनकर भगवान चैतन्य कुछ हिचकिचाये, किन्तु परमेश्वर के प्रति स्नेह के कारण उन्होंने कुछ नहीं कहा।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu felt hesitant on hearing the name of Mukunda Mata, but due to love for the Supreme Lord, he did not say anything.
तात्पर्य
एक संन्यासी को तो एक स्त्री का नाम सुनने तक की भी मनाही होती है, और श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं अपने व्रत के प्रति बहुत सख्त थे। परमेश्वर ने प्रभु को सूचित किया कि उनकी पत्नी मुकुंदारा माता उनके साथ आई हैं। उन्हें उनका नाम नहीं लेना चाहिए था, और इसलिए प्रभु एक क्षण के लिए झिझके, पर परमेश्वर के प्रति अपने लगाव के कारण, उन्होंने कुछ नहीं कहा। श्री चैतन्य महाप्रभु परमेश्वर मोडक को बचपन से जानते थे, और इसलिए परमेश्वर ने अपनी पत्नी के आगमन के बारे में प्रभु को सूचित करने में दो बार नहीं सोचा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)