श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.12.4 
अतःपर महाप्रभुर विषण्ण - अन्तर ।
कृष्णेर वियोग - दशा स्फुरे निरन्तर ॥4॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु का मन सदैव उदास रहता था, क्योंकि उनमें कृष्ण से वियोग की भावना निरंतर प्रकट होती रहती थी।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu's mind was always sad because he was constantly feeling the feeling of separation from Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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