श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.12.33 
नित्यानन्द - प्रभुर सब चरित्र - ’विपरीत’ ।
क्रुद्ध हञा लाथि मा रि’ करे तार हित ॥33॥
 
 
अनुवाद
श्री नित्यानंद प्रभु की एक विशेषता उनका विरोधाभासी स्वभाव है। जब वे क्रोधित होकर किसी को लात मारते हैं, तो वास्तव में यह उसके लाभ के लिए होता है।
 
Nityananda Prabhu's contrary nature is characteristic. When he kicks someone in anger, it is actually for their benefit.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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