श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.12.2 
जय जय श्री - चैतन्य जय दयामय ।
जय जय नित्यानन्द कृपा - सिन्धु जय ॥2॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो, जो परम दयालु हैं! नित्यानंद प्रभु की जय हो, जो दया के सागर हैं!
 
All glory to the all-merciful Sri Chaitanya Mahaprabhu! All glory to Nityananda Prabhu, the ocean of mercy!
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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