श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  3.12.125 
सघृत शाल्यन्न कला - पाते स्तूप कैला ।
कलार डोङ्गा भरि’ व्यञ्जन चौदिके धरिला ॥125॥
 
 
अनुवाद
उसने बढ़िया चावल पकाए थे, उसमें घी मिलाकर केले के पत्ते पर ऊँचे ढेर में रख दिया था। केले के पेड़ की छाल से बने बर्तनों में तरह-तरह की सब्ज़ियाँ भी रखी थीं।
 
They had cooked fine rice with ghee and piled it high on a banana leaf. Also, there were various vegetables in a bowl made from the banana peel, which they had placed around it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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