श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  3.12.114 
पथे याइते तैल - गन्ध मोर येइ पाबे ।
‘दारी सन्यासी’ करि’ आमारे कहिबे ॥114॥
 
 
अनुवाद
“यदि सड़क से गुजरने वाला कोई व्यक्ति मेरे सिर पर इस तेल की गंध ले लेता, तो वह मुझे एक दारी संन्यासी, एक तांत्रिक संन्यासी समझता जो स्त्रियों को रखता है।”
 
“If someone passing by smells this oil on my head, he will think I am a Dari Sanyasi (a Tantric monk who keeps women).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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