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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  3.12.108 
प्रभु कहे,_“सन्यासीर नाहि तैले अधिकार ।
ताहाते सुगन्धि तैल, - परम धिक्का र! ॥108॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने उत्तर दिया, "संन्यासी को तेल की, विशेषकर इस प्रकार के सुगंधित तेल की, कोई आवश्यकता नहीं है। इसे तुरंत बाहर निकाल दो।"
 
Mahaprabhu replied, "A sannyasi has no use for oil, especially such perfumed oil. Take it away immediately."
तात्पर्य
राघवानंद भट्टचार्य के अनुसार, जो कि स्मार्त नियमों के प्रवक्ता हैं:

प्रातः-स्नाने व्रते श्राद्धे द्वादश्यां ग्रहणे तथा।

मद्य-लेप-समं तेलं तस्मात् तेलं विवर्जयेत।।

"कोई व्यक्ति जो स्नान के समय, किसी अनुष्ठान के साथ व्रत करते समय, श्राद्ध के समय या द्वादशी पर शरीर पर तेल लगाता है, वह शराब को भी शरीर पर डाल सकता है। इसलिए तेल को त्याग देना चाहिए।" यह शब्द "व्रत" कभी-कभी संन्यास-व्रत को संदर्भित करता है। राघवानंद भट्टचार्य ने अपनी पुस्तक तिथि-तत्व में भी कहा है:

घृतं च सार्षपं तेलं यत् तेलं पुष्प-वासितम्।

अदुष्टं पक्व-तैलं च तैलाभ्यंगे च नित्यशः।।

इसका मतलब यह है कि घी, सरसों का तेल, फूलों से सुगंधित तेल और उबला हुआ तेल केवल गृहस्थों, हाउसहोल्डर्स द्वारा ही उपयोग किया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)