श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 12: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.12.1 
श्रूयतां श्रूयतां नित्यं गीयतां गीयतां मुदा ।
चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ताश्चैतन्य - चरितामृतम् ॥1॥
 
 
अनुवाद
हे भक्तों, श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य जीवन और चरित्रों का सदैव श्रवण, कीर्तन और ध्यान बड़ी प्रसन्नता के साथ किया जाए।
 
O devotees, the divine life of Sri Chaitanya Mahaprabhu and his qualities should be heard, sung and meditated upon daily with utmost pleasure.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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