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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 11: हरिदास ठाकुर का महाप्रयाण  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  3.11.105 
महा - भागवत हरिदास - परम - विद्वान् ।
ए सौभाग्य ला गि’ आगे करिला प्रयाण ॥105॥
 
 
अनुवाद
हरिदास ठाकुर न केवल भगवान के परम भक्त थे, बल्कि एक महान और विद्वान भी थे। यह उनका सौभाग्य था कि उनका देहांत श्री चैतन्य महाप्रभु से पहले हुआ।
 
Haridasa Thakura was not only a supreme devotee of the Lord but also a great scholar. It was his great fortune that he met Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
हरिदास ठाकुर को यहाँ सबसे अधिक विद्वान पण्डित परम-विद्वान के रूप में उल्लेख किया गया है। वास्तव में, जानने के लिए सबसे महत्वपूर्ण विज्ञान भौतिक अस्तित्व के पंजों से बाहर निकलने का विज्ञान है। जो कोई भी इस विज्ञान को जानता है उसे सबसे बड़ा विद्वान व्यक्ति माना जाना चाहिए। जो कोई भौतिक दुनिया की अस्थायी स्थिति को जानता है और आध्यात्मिक दुनिया में एक स्थायी स्थिति प्राप्त करने में विशेषज्ञ है, जो जानता है कि भगवान की सर्वोच्च हस्ती हमारे प्रायोगिक ज्ञान के अधिकार क्षेत्र से परे है, उसे सबसे अधिक विद्वान व्यक्ति समझा जाता है। हरिदास ठाकुर इस विज्ञान को पूर्ण रूप से जानते थे। इसलिए, उन्हें इस संबंध में परम-विद्वान के रूप में वर्णित किया गया है। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हरि कृष्ण महान मंत्र का जप करने के महत्व का प्रचार किया, जिसे प्रकट शास्त्रों द्वारा अनुमोदित किया गया है। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (7.5.24) में कहा गया है:

इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिस चेन नव-लक्षणा

क्रियेत भगवत्यद्धा तन मन्ये 'धीतम उत्तमम्

कृष्ण के लिए भक्ति सेवा की नौ अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण श्रवणं कीर्तन है- श्रवण और जप। हरिदास ठाकुर इस विज्ञान को बहुत अच्छी तरह से जानते थे, और इसलिए उन्हें तकनीकी रूप से सर्व-शास्त्रधिती कहा जा सकता है। जिसने भी सभी वैदिक शास्त्रों का सार सीखा है, उसे प्रथम श्रेणी का शिक्षित व्यक्ति माना जाता है, जिसे सभी शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)