यह मंदिर बाद में किसी और को बेच दिया गया, और यह पार्टी अब मंदिर की सेवा-पूजा का रखरखाव कर रही है। इस मंदिर और हरिदास ठाकुर के मकबरे के पास, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने भक्ति-कुटी नामक एक छोटा सा घर बनाया था। बंगाली वर्ष 1329 (ई. 1922) में, गौड़ीय मठ की एक शाखा पुरुषोत्तम-मठ की स्थापना वहाँ की गई। भक्ति-रत्नाकर में कहा गया है:
श्रीनिवास शीघ्र समुद्र के कूले गेला
हरिदास-ठाकुरेर समाधि देखिला
भूमिते पडिया कैला प्रणति विस्तर
भागवत-गण श्री-समाधि-सन्निधाने
श्रीनिवासे स्थिर कैला सस्नेह-वचने
पुनः श्रीनिवास श्री-समाधि प्रणामिया
ये विलाप कैला, ता शुनिले द्रवे हिया
"श्रीनिवास ठाकुर जल्दी से समुद्र तट पर भागा। जब उसने हरिदास ठाकुर के मकबरे को देखा, तो वह तुरंत गिर पड़ा और प्रार्थना करने लगा और लगभग बेहोश हो गया। वहाँ मौजूद भक्तों ने उसे बहुत ही मीठे और स्नेहमय शब्दों से शांत किया, और श्रीनिवास ने फिर से मकबरे में प्रणाम किया। हरिदास ठाकुर के मकबरे पर श्रीनिवास द्वारा व्यक्त किए गए अलगाव को सुनकर दिल पिघल जाता है।"
