‘मनुष्य’ - बुद्धि दमयन्ती करे प्रभुर पाय ।
गुरु - भोजने उदरे कभु ‘आम’ हा याय ॥19॥
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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति अपने स्वाभाविक प्रेम के कारण, दमयंती उन्हें एक साधारण मनुष्य मानती थीं। इसलिए उन्होंने सोचा कि वे अधिक भोजन करने से बीमार हो जाएँगे और उनके पेट में बलगम जमा हो जाएगा।
Because of her natural love for Sri Chaitanya Mahaprabhu, Damayanti considered him to be an ordinary human being. Therefore, she thought that eating too much would make Mahaprabhu sick and cause him to have a stomach ulcer.
तात्पर्य
पवित्र प्रेम के कारण, गोलोक वृन्दावन, वृजभूमि में कृष्ण के भक्त, कृष्ण को अपने समान एक साधारण मनुष्य के रूप में ही चाहते थे। फिर भी, हालांकि वे कृष्ण को अपने जैसा मानते थे, कृष्ण के प्रति उनका प्रेम असीम था। इसी प्रकार, अत्यधिक प्रेम के कारण, राघव पंडित और उनकी बहन, दमयंती जैसे भक्त, श्री चैतन्य महाप्रभु को एक मनुष्य के रूप में ही मानते थे, लेकिन उनका उनसे प्रेम असीम था। अधिक भोजन करने से, एक सामान्य मनुष्य अम्ल-पित्त नामक रोग से ग्रस्त हो जाता है, जो अम्लता की विशेषता वाला अपचन का एक उत्पाद है। दमयंती ने सोचा कि ऐसी स्थिति श्री चैतन्य महाप्रभु को प्रभावित कर सकती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥