एइ सब हय भक्ति - शास्त्र - सूक्ष्म मर्म ।
चैतन्येर कृपाय जाने एइ सब धर्म ॥100॥
अनुवाद
भक्ति में शिष्टाचार के ये कुछ सूक्ष्म बिंदु हैं। केवल वही व्यक्ति इन सिद्धांतों को समझ सकता है जिसे श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त हो।
These are all subtle etiquettes of devotion. Only one who has received the grace of Sri Chaitanya Mahaprabhu can understand these principles.
तात्पर्य
कर्मठ, फलप्राप्ति में ही रुचि रखने वाले कार्यकर्ता भक्ति सेवा के सूक्ष्म भावों को नहीं समझ सकते क्योंकि वे केवल इसके कर्मकांडी मूल्य को स्वीकार करते हैं पर यह नहीं समझ पाते कि भक्ति सेवा किस तरह सच्चिदानंद विग्रह परमेश्वर को सतुष्ट करती है। कर्मठ आचरण को धर्म में उन्नति, आर्थिक विकास, इंद्रिय सुख तथा मुक्ति का साधन मानते हैं। यद्यपि ये धार्मिक सिद्धांतों का पालन करने से प्राप्त होने वाले भौतिक परिणाम ही हैं, पर कर्मठ उन्हें ही सर्वस्व मानते हैं। ऐसे कर्मकांडी कार्य को कर्म कहते हैं। कर्मठ जो अपने को भक्ति सेवा का अनुयायी तो कहते हैं पर ढीले ढाले ढंग से, और इसलिए भौतिक कार्यों के ही स्तर पर बने रहते हैं, प्रकृत-सहजिया कहलाते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि माता-पिता या दाम्पत्य प्रेम में शुद्ध भक्ति सेवा कैसे निवेदित की जाती है, क्योंकि इसका बोध तो मात्र श्री चैतन्य महाप्रभु की शुद्ध भक्तों पर की गई विशेष कृपा से ही हो पाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)