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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  2.9.98 
विप्र कहे, - मूर्ख आमि, शब्दार्थ ना जानि ।
शुद्धाशुद्ध गीता पड़ि, गुरु - आज्ञा मा नि’ ॥98॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने उत्तर दिया, "मैं अनपढ़ हूँ, इसलिए शब्दों का अर्थ नहीं जानता। मैं कभी भगवद्गीता को सही ढंग से पढ़ता हूँ और कभी गलत ढंग से, लेकिन मैं यह सब अपने गुरु के आदेशानुसार कर रहा हूँ।"
 
The brahmin replied, "I am a fool, so I don't know the meaning of the words. Sometimes I recite the Bhagavad Gita correctly, sometimes incorrectly, but by doing so I am following the orders of my guru."
तात्पर्य
यह एक व्यक्ति का अच्छा उदाहरण है जो इतना सफल हो गया था कि वह भगवान गीता को गलत रूप से पढ़ने पर भी श्री चैतन्य महाप्रभु का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम था। उसकी आध्यात्मिक गतिविधियाँ भौतिक चीजों जैसे सही उच्चारण पर निर्भर नहीं थीं। बल्कि, उनकी सफलता अपने आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का सख्ती से पालन करने पर निर्भर थी।

''यस्य देवे परा भक्ति यथा देवे तथा गुरौ।।''

''तस्यैते कथिता ह्यार्थाः प्रकाशते महात्मनः।।'' (श्वेताश्वतर उप. 6.23)

वास्तव में भगवत गीता या श्रीमद् भागवतम् के शब्दों का अर्थ उस व्यक्ति को पता चलता है जो आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का कड़ाई से पालन करता है। वे उन लोगों को भी पता चलते हैं जिनकी ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व में समान आस्था है। दूसरे शब्दों में, कृष्ण और आध्यात्मिक गुरु दोनों के प्रति वफादार होना आध्यात्मिक जीवन में सफलता का रहस्य है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)