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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  2.9.96 
पुलकाश्रु, कम्प, स्वेद, - यावत्पठन ।
देखि’ आनन्दित हैल महाप्रभुर मन ॥96॥
 
 
अनुवाद
पुस्तक पढ़ते समय, ब्राह्मण को दिव्य शारीरिक परिवर्तन का अनुभव हुआ। उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए, आँखों में आँसू आ गए, और पढ़ते समय उसका शरीर काँपने लगा और पसीना बहने लगा। यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यंत प्रसन्न हुए।
 
While reciting the Bhagavad Gita, the Brahmin would experience divine physical manifestations. His hair would stand on end, his eyes would tear up, his body would tremble, and he would break into a profuse sweat. Sri Chaitanya Mahaprabhu would be delighted to see this.
तात्पर्य
यद्यपि ब्राह्मण निरक्षर होने के कारण शब्दों का उच्चारण बहुत अच्छे से नहीं कर पा रहा था, फिर भी भगवद्-गीता को पढ़ते समय उसे परमानंद के लक्षण प्राप्त हो रहे थे। श्री चैतन्य महाप्रभु उन लक्षणों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और इससे पता चलता है कि परमेश्वर भगवान विद्वतापूर्ण ज्ञान से नहीं, भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं। यद्यपि शब्दों का उच्चारण गलत हो रहा था, श्री चैतन्य महाप्रभु, स्वयं भगवान कृष्ण ने इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया। इसके विपरीत, भगवान भव (भक्ति) से प्रसन्न हुए। श्रीमद्-भागवतम (1.5.11) में इसकी पुष्टि की गई है:

तद्-वाग-विसर्गो जनताघ-विप्लवो

 यस्मिन् प्रति-श्लो कम बद्धवत्यपि

नामण्या नंतस्य यशो-’ङ्कितानि यत्

 शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः

"दूसरी ओर, जो साहित्य असीम परमेश्वर के नाम, यश, रूपों और लीलाओं की पारलৌकिक महिमा के वर्णन से भरा है, वह एक अलग रचना है, पारलौकिक शब्दों से भरा हुआ है जिसका उद्देश्य इस संसार की कुटिल सभ्यता के अधर्मी जीवन में क्रांति लाना है। ऐसे पारलौकिक साहित्य, भले ही वे अपूर्ण रूप से रचित हों, शुद्ध पुरुषों द्वारा सुने, गाए और स्वीकार किए जाते हैं जो पूरी तरह से ईमानदार हैं।"

इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए इस श्लोक के तात्पर्य पर विचार किया जा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)