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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.9.64 
महाप्रभु चलि’ आइला त्रिपति - त्रिमल्ले ।
चतुर्भुज मूर्ति देखि’ व्येङ्कटाद्र्ये चले ॥64॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु इसके बाद तिरुपति और तिरुमला पहुँचे, जहाँ उन्होंने एक चतुर्भुजी विग्रह के दर्शन किए। फिर वे वेंकट पर्वत की ओर बढ़े।
 
Then Sri Chaitanya Mahaprabhu came to Tirupati and Tirumala, where he saw the four-armed idol. After that he started towards Mount Venkata.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने वास्तव में भगवान चैतन्य महाप्रभु के भ्रमण के कालानुक्रमिक क्रम का वर्णन किया है। तिरुपति मंदिर को कभी-कभी तिरुपटूर कहा जाता है। यह चंद्रगिरि जिले में अरकॉट के उत्तरी किनारे पर स्थित है। यह एक प्रसिद्ध पवित्र तीर्थ स्थल है। उनके नाम के अनुसार, चार-भुजाधारी भगवान विष्णु, वेंकटेश्वर, बालाजी की देवता, अपनी शक्तियों श्री और भू के साथ, तिरुपति से लगभग आठ मील दूर वेंकट पहाड़ी पर स्थित है। यह वेंकटेश्वर देवता भगवान विष्णु के रूप में है, और जिस स्थान पर वह स्थित है उसे वेंकट-क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। दक्षिणी भारत में कई मंदिर हैं, लेकिन यह बालाजी मंदिर विशेष रूप से समृद्ध है। आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) के महीने में वहां एक महान मेला आयोजित किया जाता है। दक्षिणी रेलवे में तिरुपति नाम से एक रेलवे स्टेशन है। निमन-तिरुपति वेंकट हिल की घाटी में स्थित है। वहां कई मंदिर भी हैं, जिनके बीच गोविंदराज और भगवान रामचंद्र के मंदिर हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)