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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.9.53 
अपवित्र अन्न एक था लिते भरिया ।
प्रभु - आगे निल ‘महा - प्रसाद’ बलिया ॥53॥
 
 
अनुवाद
अपनी योजना बनाकर, बौद्ध लोग भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष अछूत भोजन की एक थाली लाए और उसे महाप्रसाद कहा।
 
After hatching the conspiracy, those Buddhists brought the plate of impure food before Sri Chaitanya Mahaprabhu and said that this was Mahaprasad.
तात्पर्य
अपवित्र अन्न से तात्पर्य है ऐसे भोजन से जिसे वैष्णव स्वीकार्य नहीं मानता। दूसरे शब्दों में, एक वैष्णव किसी अवैष्णव के द्वारा महाप्रसाद के नाम पर अर्पित किए गए भोजन को स्वीकार नहीं कर सकता है। यह सभी वैष्णवों के लिए एक सिद्धांत होना चाहिए। जब यह पूछा गया, "एक वैष्णव का व्यवहार क्या है?" श्री चैतन्य महाप्रभु ने जवाब दिया, "एक वैष्णव को एक अवैष्णव [असत] की संगति का त्याग करना चाहिए।" असत शब्द का तात्पर्य एक अवैष्णव से है, अर्थात जो वैष्णव नहीं है। असत-संग त्याग, - एई वैष्णव-आचार (सीसी मध्य 22.87)। इस संबंध में एक वैष्णव को बहुत सख्त होना चाहिए और उसे किसी अवैष्णव के साथ सहयोग नहीं करना चाहिए। यदि कोई अवैष्णव भोजन को महाप्रसाद के नाम पर अर्पित करता है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे भोजन को प्रसाद नहीं बनाया जा सकता क्योंकि एक अवैष्णव भगवान को कुछ भी अर्पित नहीं कर सकता। कभी-कभी कृष्ण चेतना आंदोलन में प्रचारकों को एक ऐसे घर में भोजन स्वीकार करना पड़ता है जहां गृहस्थ एक अवैष्णव होता है; हालाँकि, अगर यह भोजन देवता को अर्पित किया जाता है, तो इसे लिया जा सकता है। किसी अवैष्णव द्वारा पकाया गया साधारण भोजन का वैष्णव द्वारा स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। भले ही कोई अवैष्णव बिना किसी गलती के भोजन पकाता है, वह उसे भगवान विष्णु को अर्पित नहीं कर सकता है, और इसे महाप्रसाद के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। भगवद्-गीता (9.26) में भगवान कृष्ण के अनुसार:

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति

तदहं भक्त्युपहृतं अश्नामि प्रयतात्मनः

"यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति से एक पत्र, एक फूल, एक फल या पानी अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार करूंगा।" कृष्ण अपने भक्त द्वारा भक्ति के साथ अर्पित की गई किसी भी चीज़ को स्वीकार कर सकते हैं। एक अवैष्णव शाकाहारी और बहुत साफ-सुथरा रसोइया हो सकता है, लेकिन क्योंकि वह विष्णु को भोजन अर्पित नहीं कर सकता, इसे महाप्रसाद के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बेहतर है कि एक वैष्णव ऐसे भोजन को अछूत के रूप में त्याग दे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)