(१) सृष्टि शाश्वत है, इसलिए सृष्टिकर्ता को स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
(२) यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति मिथ्या है।
(३) "मैं हूँ" सत्य है।
(४) जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति होती है।
(५) भगवान बुद्ध ही सत्य को समझने का एकमात्र स्रोत हैं।
(६) निर्वाण या विनाश का सिद्धांत ही अंतिम लक्ष्य है।
(७) बुद्ध का दर्शन ही एकमात्र दार्शनिक पथ है।
(८) वेदों का संकलन मनुष्यों द्वारा किया गया है।
(९) पवित्र क्रियाकलाप, दूसरों पर दया दिखाना आदि की सलाह दी जाती है।
किसी भी व्यक्ति को तर्क से परम सत्य नहीं मिल सकता। हो सकता है कि कोई व्यक्ति तर्क में बहुत निपुण हो और कोई अन्य व्यक्ति तर्क की कला में उससे भी अधिक निपुण हो। क्योंकि तर्क में शब्दों की बहुत जादूगरी होती है, इसलिए तर्क द्वारा परम सत्य के बारे में कोई वास्तविक निष्कर्ष कभी नहीं निकाला जा सकता। वैदिक सिद्धांतों के अनुयायी इस बात को समझते हैं। हालाँकि, यहाँ यह देखा गया है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने बौद्ध दर्शन को तर्क द्वारा पराजित किया। जो लोग आईएसकेकॉन में प्रचारक हैं, वे निश्चित रूप से कई ऐसे लोगों से मिलेंगे जो बौद्धिक तर्कों में विश्वास करते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वेदों के अधिकार में विश्वास नहीं करते हैं। फिर भी, वे बौद्धिक अनुमान और तर्क को स्वीकार करते हैं। इसलिए कृष्ण चेतना के प्रचारकों को तर्क से दूसरों को पराजित करने के लिए तैयार रहना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे श्री चैतन्य महाप्रभु ने किया था। इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है, तर्के खंडिला प्रभु। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने इतना मजबूत तर्क दिया कि बौद्ध अपने पंथ को स्थापित करने के लिए उनका मुकाबला नहीं कर सके।
उनका पहला सिद्धांत यह है कि सृष्टि हमेशा से अस्तित्व में रही है। लेकिन अगर ऐसा होता, तो विनाश का कोई सिद्धांत नहीं हो सकता था। बौद्धों का कहना है कि विनाश या विघटन सर्वोच्च सत्य है। यदि सृष्टि शाश्वत रूप से विद्यमान है, तो विघटन या विनाश का प्रश्न ही नहीं उठता। यह तर्क बहुत मजबूत नहीं है क्योंकि व्यावहारिक अनुभव से हम देखते हैं कि भौतिक चीजों की एक शुरुआत, एक मध्य और एक अंत होता है। बौद्ध दर्शन का अंतिम उद्देश्य शरीर को विघटित करना है। यह इसलिए प्रस्तावित किया जाता है क्योंकि शरीर की एक शुरुआत होती है। इसी तरह, संपूर्ण ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति एक विशाल शरीर है, लेकिन अगर हम स्वीकार करते हैं कि यह हमेशा अस्तित्व में रहता है, तो विनाश का कोई प्रश्न नहीं हो सकता। इसलिए शून्य प्राप्त करने के लिए हर चीज को नष्ट करने का प्रयास एक बेतुकापन है। अपने स्वयं के व्यावहारिक अनुभव से हमें सृष्टि की शुरुआत को स्वीकार करना होगा, और जब हम शुरुआत को स्वीकार करते हैं, तो हमें एक सृष्टिकर्ता को स्वीकार करना होगा। ऐसे सृष्टिकर्ता के पास एक सर्वव्यापी शरीर होना चाहिए, जैसा कि भगवद्गीता (13.14) में बताया गया है:
सर्वतः पाणि-पादं तत सर्वतोऽक्षि-शिरो-मुखं
सर्वतः श्रुति-मल् लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति
"हर जगह उनके हाथ और पैर हैं, उनकी आँखें, सिर और मुख हैं, और उनके हर जगह कान हैं। इस प्रकार परमात्मा हर चीज में व्याप्त रहकर विद्यमान है।"
सर्वोच्च व्यक्ति को हर जगह उपस्थित रहना चाहिए। सृष्टि से पहले उनका शरीर मौजूद था, अन्यथा वे सृष्टिकर्ता नहीं हो सकते थे। यदि सर्वोच्च व्यक्ति एक सृजित प्राणी है, तो सृष्टिकर्ता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति निश्चित रूप से एक निश्चित समय पर बनाई गई है, और सृष्टि से पहले सृष्टिकर्ता मौजूद था; इसलिए सृष्टिकर्ता कोई सृजित प्राणी नहीं है। सृष्टिकर्ता परब्रह्म या सर्वोच्च आत्मा है। पदार्थ न केवल आत्मा के अधीन है बल्कि वास्तव में आत्मा के आधार पर बनाया गया है। जब आत्मा माँ के गर्भ में प्रवेश करती है, तो शरीर माँ द्वारा आपूर्ति की गई भौतिक सामग्री द्वारा बनाया जाता है। भौतिक दुनिया में सब कुछ बनाया गया है, और परिणामस्वरूप एक सृष्टिकर्ता होना चाहिए जो सर्वोच्च आत्मा है और जो पदार्थ से भिन्न है। भगवद्गीता में यह पुष्टि की जाती है कि भौतिक ऊर्जा हीन है और आध्यात्मिक ऊर्जा सजीव इकाई है। निम्न और उच्च श्रेणी की दोनों ऊर्जाएँ एक सर्वोच्च व्यक्ति से संबंधित हैं।
बुद्धिस्टों का तर्क है कि संसार झूठा है, लेकिन यह वैध नहीं है। संसार अस्थायी है, लेकिन यह झूठा नहीं है। जब तक हमारे शरीर हैं, तब तक हमें शरीर के सुख-दुख सहने होंगे, भले ही हम शरीर नहीं हैं। हो सकता है कि हम इन सुख-दुखों को बहुत गंभीरता से न लें, लेकिन वे तथ्यात्मक हैं। हम वास्तव में यह नहीं कह सकते कि वे झूठे हैं। यदि शारीरिक पीड़ाएँ और सुख झूठे होते, तो सृष्टि भी झूठी होती, और परिणामस्वरूप कोई भी इसमें अधिक रुचि नहीं लेता। निष्कर्ष यह है कि भौतिक सृष्टि झूठी या काल्पनिक नहीं है, बल्कि यह अस्थायी है।
बुद्धिस्ट बताते हैं कि सिद्धांत "मैं हूँ" परम सत्य है, लेकिन यह "मैं" और "तुम" की व्यक्तिगतता को बाहर करता है। यदि कोई "मैं" और "तुम" या व्यक्तिगतता नहीं है, तो तर्क की कोई संभावना नहीं है। बौद्ध दर्शन तर्क पर निर्भर करता है, लेकिन यदि कोई केवल "मैं हूँ" पर निर्भर करता है, तो कोई तर्क नहीं हो सकता। एक "तुम," या एक और व्यक्ति भी होना चाहिए। द्वैत का दर्शन - व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व - वहाँ होना चाहिए। यह भगवद-गीता (2.12) के दूसरे अध्याय में पुष्टि की गई है, जिसमें भगवान कहते हैं:
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयं अतः परम्
"न तो वह समय था जब मैं नहीं था, न तुम थे, न ही ये सभी राजा; और न ही भविष्य में हम में से कोई भी नहीं रहेगा।"
हम अतीत में भिन्न-भिन्न शरीरों में विद्यमान थे, और इस शरीर के नष्ट होने के बाद हम किसी अन्य शरीर में विद्यमान रहेंगे। आत्मा का सिद्धांत शाश्वत है, और यह इस शरीर में या किसी अन्य शरीर में मौजूद है। इस जीवनकाल में भी हम एक बच्चे के शरीर, एक युवा के शरीर, एक आदमी के शरीर और एक बूढ़े शरीर में अस्तित्व का अनुभव करते हैं। शरीर के नष्ट होने के बाद, हम एक और शरीर प्राप्त करते हैं। बौद्ध धर्म भी पुनर्जन्म के दर्शन को स्वीकार करता है, लेकिन बौद्ध अगले जन्म की ठीक से व्याख्या नहीं करते हैं। जीवन की 8,400,000 प्रजातियाँ हैं, और हमारा अगला जन्म उनमें से किसी एक में हो सकता है; इसलिए इस मानव शरीर की कोई गारंटी नहीं है।
बौद्धों के पांचवें सिद्धांत के अनुसार, भगवान बुद्ध ही ज्ञान प्राप्ति का एकमात्र स्रोत हैं। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि भगवान बुद्ध ने वैदिक ज्ञान के सिद्धांतों को अस्वीकार कर दिया था। किसी को मानक ज्ञान के सिद्धांत को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि कोई केवल बौद्धिक अनुमान से परम सत्य प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि हर कोई एक अधिकार है, या यदि हर कोई अपनी समझ को अंतिम मानदंड के रूप में स्वीकार करता है - जैसा कि वर्तमान में फैशनेबल है - तो शास्त्रों की कई अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की जाएगी, और हर कोई दावा करेगा कि उनका अपना दर्शन सर्वोच्च है। यह एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है, और हर कोई अपने तरीके से शास्त्रों की व्याख्या कर रहा है और अपने अधिकार का आधार स्थापित कर रहा है। यथा मता तत्था पथा। अब हर कोई अपने सिद्धांत को परम सत्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। बौद्धों का सिद्धांत है कि विनाश, या निर्वाण, अंतिम लक्ष्य है। विनाश शरीर पर लागू होता है, लेकिन आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित होती है। यदि ऐसा नहीं होता, तो इतने सारे विविध शरीर कैसे अस्तित्व में आ सकते हैं? यदि अगला जन्म एक तथ्य है, तो अगला शारीरिक रूप भी एक तथ्य है। जैसे ही हम एक भौतिक शरीर को स्वीकार करते हैं, हमें इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि वह शरीर नष्ट हो जाएगा और हमें दूसरा शरीर स्वीकार करना होगा। यदि सभी भौतिक शरीरों का विनाश होना है, तो हमें एक अमूर्त शरीर, या एक आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करना होगा, यदि हम चाहते हैं कि अगला जन्म झूठेपन के अलावा कुछ भी हो। आध्यात्मिक शरीर कैसे प्राप्त किया जाता है, इसकी व्याख्या भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (4.9) में की है:
जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवम् यो वेत्ति तत्त्वतः
त्यक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति माम एति सोऽर्जुन
"जो मेरे प्रकट होने और कार्य की पारलौकिक प्रकृति को जानता है, वह शरीर छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुन: जन्म नहीं लेता, परन्तु मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त होता है, हे अर्जुन।"
ये सर्वोच्च पूर्णता है - अपने भौतिक शरीर को त्याग देना और दूसरा शरीर न स्वीकार करना बल्कि घर वापस, भगवान के पास लौटना। यह नहीं है कि पूर्णता का मतलब है कि किसी का अस्तित्व शून्य हो जाता है या शून्य हो जाता है। अस्तित्व जारी रहता है, लेकिन अगर हम सकारात्मक रूप से भौतिक शरीर को नष्ट करना चाहते हैं, तो हमें एक आध्यात्मिक शरीर को स्वीकार करना होगा; अन्यथा आत्मा का कोई शाश्वत अस्तित्व नहीं हो सकता।
हम इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकते कि बौद्ध दर्शन ही एकमात्र तरीका है, क्योंकि उस दर्शन में बहुत सारे दोष हैं। एक परिपूर्ण दर्शन वह है जिसमें कोई दोष नहीं है, और वह वेदांत दर्शन है। वेदांत दर्शन में कोई भी कोई दोष नहीं बता सकता और इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वेदांत सत्य को समझने का सर्वोच्च दार्शनिक तरीका है। बौद्ध धर्म के अनुसार, वेदों का संकलन साधारण मनुष्यों द्वारा किया जाता है। यदि यह मामला होता, तो वे आधिकारिक नहीं होते। वैदिक साहित्यों से हम समझते हैं कि सृजन के तुरंत बाद भगवान ब्रह्मा को वेदों में शिक्षा दी गई थी। ऐसा नहीं है कि वेदों को ब्रह्मा ने बनाया था, हालांकि ब्रह्मा ब्रह्मांड में मूल व्यक्ति हैं। यदि ब्रह्मा ने वेदों का निर्माण नहीं किया लेकिन उन्हें पहले बनाए गए प्राणी के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान कहाँ से मिला? जाहिर है कि वेद इस भौतिक दुनिया में जन्मे किसी सामान्य व्यक्ति से नहीं आए थे। श्रीमद्भागवतम् के अनुसार, तेने ब्रह्म हृद्या आदी-कवये: सृजन के बाद, परम व्यक्ति ने ब्रह्मा के हृदय में वैदिक ज्ञान दिया। सृष्टि की शुरुआत में ब्रह्मा के सिवाय कोई अन्य व्यक्ति नहीं था, फिर भी उन्होंने वेदों का संकलन नहीं किया; इसलिए निष्कर्ष यह है कि वेदों का संकलन किसी भी सृजित प्राणी द्वारा नहीं किया गया था। वैदिक ज्ञान भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा दिया गया था, जिन्होंने इस भौतिक दुनिया का निर्माण किया था। यह शंकराचार्य द्वारा भी स्वीकार किया जाता है, हालांकि वह वैष्णव नहीं हैं।
यह कहा गया है कि दया एक बौद्ध के गुणों में से एक है, लेकिन दया एक सापेक्ष चीज है। हम अपनी दया एक अधीनस्थ को या किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाते हैं जो हमसे ज्यादा पीड़ित है। हालाँकि, यदि कोई श्रेष्ठ व्यक्ति मौजूद है, तो श्रेष्ठ व्यक्ति हमारी दया का विषय नहीं हो सकता। बल्कि हम श्रेष्ठ व्यक्ति की दया के पात्र हैं। इसलिए करुणा और दया दिखाना एक सापेक्ष क्रिया है। यह परम सत्य नहीं है। इसके अलावा, हमें यह भी पता होना चाहिए कि वास्तविक दया क्या है। किसी बीमार व्यक्ति को उसके खाने के लिए मना किया हुआ कुछ देना दया नहीं है। बल्कि यह क्रूरता है। जब तक हम नहीं जानते कि दया वास्तव में क्या है, हम एक अवांछनीय स्थिति पैदा कर सकते हैं। यदि हम वास्तविक दया दिखाना चाहते हैं, तो हम मानव जाति की खोई हुई चेतना, जीवित इकाई की मूल चेतना को पुनर्जीवित करने के लिए कृष्ण चेतना का प्रचार करेंगे। चूंकि बौद्ध दर्शन आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है, इसलिए बौद्धों की तथाकथित दया दोषपूर्ण है।
