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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 362
 
 
श्लोक  2.9.362 
एइ कलि - काले आर नाहि कोन धर्म ।
वैष्णव, वैष्णव - शास्त्र, एइ कहे मर्म ॥362॥
 
 
अनुवाद
इस कलियुग में वैष्णव भक्तों और वैष्णव धर्मग्रंथों द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अलावा कोई भी वास्तविक धार्मिक सिद्धांत नहीं है। यही सबका सार है।
 
In this Kaliyuga, there is no true religion. Only the principles established by Vaishnava devotees and Vaishnava scriptures remain. This is the essence of everything.
तात्पर्य
भक्ति की प्रक्रिया और उस प्रक्रिया का समर्थन करने वाले शस्त्रों में दृढ़ विश्वास होना चाहिए। अगर कोई इस विश्वास से श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यों को सुनता है, तो वह अपनी ईर्ष्यालु स्थिति से मुक्त हो सकता है। श्रीमद- भागवतम ऐसे ही ईर्ष्या रहित व्यक्तियों ( निर्मत्सराणां सताम् ) के लिए हैं। इस युग में व्यक्ति को श्री चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए बल्कि हरि और कृष्ण – महामंत्र के पवित्र नामों का जाप करना चाहिए। वही सनातन धर्म के नाम से जाने जाने वाले सनातन धर्म का सार है। इस श्लोक में 'वैष्णव' शब्द एक शुद्ध भक्त और पूर्णतः आत्मज्ञानी आत्मा को दर्शाता है और 'वैष्णव - शास्त्र' शब्द श्रुति या वेदों को दर्शाता है, जिसे शब्द प्रमाण, दिव्य ध्वनि का साक्ष्य कहा जाता है। जो व्यक्ति वैदिक साहित्य का कड़ाई से पालन करता है और भगवान के पवित्र नाम का जप करता है , वह वास्तव में दिव्य अनुवांशिक उत्तराधिकार में स्थित होगा। जो लोग जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इस सिद्धांत का पालन करना चाहिए। श्रीमद - भागवतम (11.19.17) में, यह कहा गया है:

श्रुतिः प्रत्यक्षम ऐतिहासिक अनुमानम चतुष्‍टयम

प्रमाणेष्व अनवस्थानद विकल्पांत सा विराज्यते

"वैदिक साहित्य, प्रत्यक्ष प्रत्यक्षण, इतिहास और परिकल्पना ये साक्ष्य सिद्धांतों के चार प्रकार हैं। परम सत्य की प्राप्ति के लिए प्रत्येक को इन सिद्धांतों से जुड़े रहना चाहिए।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)