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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 357
 
 
श्लोक  2.9.357 
एक रामानन्द राय बहु सुख दिल ।
भट्ट कहे , - एइ ला गि’ मिलिते कहिल ॥357॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, “मुझे रामानन्द राय की बातों से बहुत आनंद मिला।”
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu continued, “I was very happy with Ramanand Rai’s words.” Bhattacharya replied, “That is why I requested you to meet him.”
तात्पर्य
भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, "इसी कारण मैंने अनुरोध किया था कि आप उनसे मिलें।"

श्री चैतन्य-चंद्रोदय (आठवें अंक की शुरुआत) में श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, "सार्वभौम, मैं कई पवित्र स्थानों की यात्रा कर चुका हूं, परंतु मुझे आप जैसा अच्छा वैष्णव कहीं नहीं मिल पाया। हालांकि, मुझे यह स्वीकार करना होगा कि रामानांद राय अद्भुत हैं।"

सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, "इसलिए, मेरे प्रभु, मैंने आपसे अनुरोध किया था कि आप उनसे मिलें।"

श्री चैतन्य महाप्रभु फिर कहते हैं, "बेशक, इन पवित्र स्थानों में बहुत सारे वैष्णव हैं, और उनमें से अधिकांश भगवान नारायण की पूजा करते हैं। अन्य, जिन्हें तत्ववादी कहा जाता है, वे भी लक्ष्मी-नारायण के उपासक हैं, परंतु वे शुद्ध वैष्णव संप्रदाय से संबंधित नहीं हैं। भगवान शिव के कई उपासक हैं, और बहुत सारे नास्तिक भी हैं। भले ही, मेरे प्रिय भट्टाचार्य, मैं रामानांद राय और उनके विचारों को बहुत पसंद करता हूं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)