श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 325
 
 
श्लोक  2.9.325 
रायेर आनन्द हैल पुस्तक पाइया ।
प्रभु - सह आस्वादिल, राखिल लिखिया ॥325॥
 
 
अनुवाद
रामानन्द राय ये पुस्तकें पाकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान के साथ उनकी विषय-वस्तु का स्वाद लिया और प्रत्येक की एक-एक प्रति बनाई।
 
Ramanand Rai was overjoyed to receive these books. He enjoyed them with Mahaprabhu and made a copy of both.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)