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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 289
 
 
श्लोक  2.9.289 
श्रीपाद, धर मोर गोसाञि र सम्बन्ध ।
ताहा विना अन्यत्र नाहि एइ प्रेमार गन्ध ॥289॥
 
 
अनुवाद
“आपका परम पावन निश्चित रूप से श्री माधवेन्द्र पुरी से संबंधित हैं, जिनके बिना परमानंद प्रेम की सुगंध नहीं आती।”
 
“O Shripad, you are related to Shri Madhavendra Puri, without whom there is no fragrance of Premananda.”
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्ता सरस्वती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि श्रीपाद लक्ष्मीपति तीर्थ के आगमन तक, माधवाचार्य की शिष्य परंपरा में अकेले भगवान कृष्ण की उपासना करना प्रणाली थी। श्रील माधवेंद्र पुरी के पश्चात, राधा और कृष्ण दोनों की उपासना स्थापित हुई थी। इस कारण से श्री माधवेंद्र पुरी को आनंदित प्रेम में उपासना की जड़ के रूप में स्वीकार किया जाता है। जब तक कोई माधवेंद्र पुरी की शिष्य परंपरा से जुड़ा नहीं होता, आनंदित प्रेम के लक्षणों को जगाने का कोई संभावना नहीं होती। इस संबंध में गोस्वामी शब्द महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक गुरु जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है और जिसका भगवान की सेवा के अलावा कोई अन्य काम नहीं है, उसे परमहंस में श्रेष्ठ कहा जाता है। एक परमहंस में इंद्रिय तृप्ति के लिए कोई कार्यक्रम नहीं होता है; वह केवल भगवान की इंद्रियों को संतुष्ट करने में रूचि रखता है। जो इस तरह इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है उसे गोस्वामी या गोस्वामी कहा जाता है, इंद्रियों का स्वामी। इंद्रियों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता जब तक कि कोई भगवान की सेवा में संलग्न न हो; इसलिए प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु, जिसका अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण है, दिन में चौबीस घंटे भगवान की सेवा में संलग्न रहता है। इसलिए उसे गोस्वामी या गोस्वामी के रूप में संबोधित किया जा सकता है। गोस्वामी की उपाधि विरासत में नहीं ली जा सकती लेकिन केवल एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु को ही दी जा सकती है।

वृंदावन के छह महान गोस्वामी थे - श्रील रूप, सनातन, भट्ट राघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट और दास राघुनाथ - और उनमें से किसी ने भी गोस्वामी की उपाधि विरासत में नहीं ली थी। वृंदावन के सभी गोस्वामी प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु थे जो भक्ति सेवा के उच्चतम मंच पर स्थित थे, और इस कारण से उन्हें गोस्वामी कहा जाता था। वृंदावन के सभी मंदिर निश्चित रूप से छह गोस्वामियों द्वारा शुरू किए गए थे। बाद में मंदिरों में पूजा गोस्वामियों के कुछ गृहस्थ शिष्यों को सौंपी गई, और तभी से गोस्वामी की वंशानुगत उपाधि का उपयोग किया जाता रहा है। हालाँकि, केवल वही जो एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु है जो श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ, कृष्ण चेतना आंदोलन का विस्तार करता है, और जो अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है, उसे गोस्वामी के रूप में संबोधित किया जा सकता है। दुर्भाग्य से, वंशानुगत प्रक्रिया जारी है; इसलिए वर्तमान समय में, ज्यादातर मामलों में शब्द की व्युत्पत्ति की अज्ञानता के कारण उपाधि का दुरुपयोग किया जा रहा है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)