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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 282
 
 
श्लोक  2.9.282 
तथा हैते पाण्डरपुरे आइला गौरचन्द्र ।
विठ्ठल - ठाकुर देखि’ पाइला आनन्द ॥282॥
 
 
अनुवाद
वहां से श्री चैतन्य महाप्रभु पंडारापुरा गए, जहां उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक विट्ठल ठाकुर का मंदिर देखा।
 
From there Sri Chaitanya Mahaprabhu went to Pandharpur, where he happily saw the temple of Vitthal Thakur.
तात्पर्य
पाण्‍डरपुर शहर भीमा नदी के तट पर स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान चैतन्य महाप्रभु ने पाण्‍डरपुर आए समय ही तुकाराम को दीक्षित किया था और इस तरह से तुकाराम उनके शिष्‍य बने। तुकाराम आचार्य महाराष्‍ट्र प्रांत में बहुत प्रसिद्ध हुए और उन्‍होंने पूरे प्रांत में संकीर्तन आंदोलन का प्रसार किया। तुकाराम से संबंधित संकीर्तन दल आज भी बॉम्‍बे और महाराष्‍ट्र प्रांत के विभिन्‍न भागों में बहुत लोकप्रिय है। तुकाराम की पुस्‍तक को अभंग के नाम से जाना जाता है। उनका संकीर्तन दल बिल्‍कुल गौड़ीय-वैष्‍णव संकीर्तन दलों जैसा ही है, क्‍योंकि वे प्रभु के पवित्र नामों का मृदंग और करतल लेकर जाप करते हैं।

भगवान विट्ठलदेव का इस श्‍लो‍क में उल्‍लेख प्रभु विष्‍णु का द्विभुजी रूप है। वे नारायण हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)