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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 279
 
 
श्लोक  2.9.279 
त्रितकूपे विशालार करि’ दरशन ।
पञ्चाप्सरा - तीर्थे आइला शचीर नन्दन ॥279॥
 
 
अनुवाद
माता शची के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु इसके बाद त्रितकूप गए और वहाँ विशाला विग्रह का दर्शन करने के बाद वे पंचप्सरा तीर्थ नामक पवित्र स्थान पर गए।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu, the son of Mother Shachi, then went to Tritakupa and after seeing the Visal Deity there, he went to the pilgrimage place called Panchapsara.
तात्पर्य
अप्सराएँ, आकाशीय ग्रहों की निवासी, को सामान्यतः नर्तकियाँ कहा जाता है। आकाशीय ग्रहों की स्त्रियाँ अत्यधिक सुंदर होती हैं, और यदि पृथ्वी पर कोई स्त्री बहुत सुंदर पाई जाती है, तो उसकी तुलना अप्सराओं से की जाती है। लता, बुद्बुदा, समीची, सौरभेयी और वर्णा नामक पाँच अप्सराएँ थीं। यह कहा जाता है कि इन पाँच सुंदर नर्तकियों को इंद्र ने अच्युत ऋषि नामक एक संत की कठोर तपस्या भंग करने के लिए भेजा था। यह इंद्र, स्वर्ग के राजा की एक खास हरकत थी। जब भी इंद्र को पता चलता था कि कोई व्यक्ति कठोर तपस्या कर रहा है, तो वह अपने पद के लिए डरने लगता था। इंद्र हमेशा अपनी स्थिति को लेकर चिंतित रहता था, उसे डर था कि अगर कोई व्यक्ति उससे अधिक शक्तिशाली हो गया, तो वह अपना ऊंचा पद खो देगा। इसलिए जैसे ही वह किसी संत को कठोर तपस्या करते हुए देखता, वह नर्तकियों को उसे विचलित करने के लिए भेज देता था। यहाँ तक कि महान संत विश्वामित्र मुनि भी उसकी योजना के शिकार हो गए थे।

जब पाँच अप्सराएँ अच्युत ऋषि का ध्यान भंग करने गईं, तो उन सभी को संत ने शाप दिया था। परिणामस्वरूप, लड़कियाँ एक झील में मगरमच्छों में बदल गईं, जिसे पंचाप्सरा के नाम से जाना जाने लगा। भगवान रामचंद्र ने भी इस स्थान का दौरा किया था। श्री नारद मुनि के वर्णन से, यह समझा जाता है कि जब अर्जुन पवित्र स्थानों की यात्रा करने गए, तो उन्हें पांच अप्सराओं की निंदा के बारे में पता चला। उन्होंने उन्हें उनकी घृणित स्थिति से मुक्त किया, और उस दिन से पंचाप्सरा नामक झील तीर्थ स्थल बन गया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)