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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 270
 
 
श्लोक  2.9.270 
नारायण - पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति ।
स्वर्गापवर्ग - नरकेष्वपि तुल्यार्थ - दर्शिनः ॥270॥
 
 
अनुवाद
"भगवान नारायण का भक्त नारकीय स्थिति से नहीं डरता, क्योंकि वह उसे स्वर्ग प्राप्ति या मोक्ष के समान ही मानता है। भगवान नारायण के भक्त इन सभी चीज़ों को एक ही स्तर पर देखने के आदी होते हैं।"
 
"A devotee of Lord Narayana does not fear hell, because he considers it the same as going to heaven or attaining salvation. Devotees of Lord Narayana are accustomed to considering these things the same."
तात्पर्य
श्रीमद भागवतम (6.17.28) में चित्रकेतु के चरित्र पर एक श्लोक है। एक बार चित्रकेतु ने माता पार्वती को भगवान शम्भु (शिव) की गोद में बैठे देखा तो उन्होंने भगवान शिव की निन्दा की कि लज्जाहीन की भांति वे अपनी पत्नी के साथ गोद में बैठे हैं जैसे कोई साधारण मनुष्य हो। इस निन्दा के कारण पार्वती ने चित्रकेतु को शाप दे दिया। वे आगे चलकर वृत्रासुर नामक राक्षस बने। चित्रकेतु एक बहुत ही शक्तिशाली राजा और भक्त थे और वे भगवान शिव का भी प्रतिकार कर सकते थे, लेकिन जब पार्वती ने उन्हें शाप दिया तो उन्होंने सहर्ष सिर झुकाकर शाप स्वीकार कर लिया। शाप स्वीकार करने पर भगवान शिव ने चित्रकेतु की प्रशंसा की और पार्वती से कहा कि भगवान नारायण के भक्त को कभी भी किसी स्थिति को स्वीकार करने में डर नहीं होता यदि भगवान को सेवा करने का अवसर मिले। यही इस कथन का भाव है - नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)