मन-मना भव मद-भक्तो मद्-याजी माँ नमस्करु
माम एवैष्यामि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे
सर्व-धर्मं परिषज्य माँ एकं शरणं व्रज
अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः
"हमेशा मेरे बारे में सोचो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे श्रद्धांजलि अर्पित करो। इस प्रकार तुम बिना किसी असफलता के मेरे पास आओगे। मैं तुमसे यह वादा करता हूँ क्योंकि तुम मेरे बहुत ही प्रिय मित्र हो। सभी प्रकार के धर्मों को त्याग दो और बस मुझे समर्पित हो जाओ। मैं तुम्हें सभी पापमय प्रतिक्रियाओं से मुक्त कर दूँगा। डरो नहीं।" इस तरह व्यक्ति भगवान की प्रेममयी सेवा करने की अपनी मूल स्थिति को विकसित करता है।
व्यक्ति को कर्म-काण्ड या ज्ञान-काण्ड द्वारा भक्ति सेवा के उच्चतम मंच तक नहीं पहुँचाया जा सकता है। शुद्ध भक्ति सेवा को केवल शुद्ध भक्तों के साथ संपर्क के माध्यम से ही समझा और प्राप्त किया जा सकता है। इस संबंध में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि कर्म-काण्ड गतिविधियाँ दो प्रकार की होती हैं - पवित्र और अपवित्र। पवित्र गतिविधियाँ निश्चित रूप से अपवित्र गतिविधियों से बेहतर होती हैं, लेकिन पवित्र गतिविधियाँ भी भगवान कृष्ण के प्रति परमानंदपूर्ण प्रेम नहीं ला सकती हैं। पवित्र और अपवित्र गतिविधियाँ भौतिक सुख और संकट ला सकती हैं, लेकिन केवल पवित्र या अपवित्र कार्य करके किसी के शुद्ध भक्त बनने की कोई संभावना नहीं है। भक्ति, भक्ति सेवा का अर्थ है कृष्ण को संतुष्ट करना। प्रत्येक प्रकट शास्त्र में, चाहे वह ज्ञान-काण्ड पर बल देता हो या कर्म-काण्ड पर, त्याग के सिद्धांत की हमेशा प्रशंसा की जाती है। वैदिक ज्ञान का परिपक्व फल, श्रीमद्-भागवतम, सर्वोच्च वैदिक प्रमाण है। श्रीमद्-भागवतम (1.5.12) में कहा गया है:
नैष्कर्म्यम अप्य अच्युत-भाव-वर्जित
ज्ञनं अलं निरंजनम्
कुतः पुनः शश्वद अभद्रं ईश्वरे
न च अर्पितं कर्म यद् अपि अकारणम्
"आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान, भले ही सभी भौतिक संबंधों से मुक्त हो, लेकिन अचूक [भगवान] की अवधारणा से रहित होने पर अच्छा नहीं लगता है। तो फिर, फलदायी गतिविधियों का क्या उपयोग है, जो स्वभाव से शुरू से ही कष्टदायी और क्षणिक हैं, यदि उनका उपयोग प्रभु की भक्ति सेवा के लिए नहीं किया जाता है?" इसका अर्थ यह है कि भले ही ज्ञान, जो कि फलदायी गतिविधि से श्रेष्ठ है, असफल है यदि वह भक्ति सेवा से रहित है। इसलिए श्रीमद्-भागवतम में - शुरुआत, मध्य और अंत में - कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड की निंदा की जाती है। उदाहरण के लिए, श्रीमद्-भागवतम 1.1.2 में कहा गया है, धर्म: प्रोज्जहित-कैतवोऽत्र।
इसकी व्याख्या श्रीमद्-भागवतम (11.11.32) और भगवद-गीता (18.66) से लिए गए निम्नलिखित श्लोकों में की गई है।
