धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सताम्
वेद्यं वास्तवं अत्र वस्तु शिव-दं ताप-त्रयोन्मूलनम
श्रीमद्-भागवते महा-मुनि-कृत किं वा परैरीश्वरः
सद्यो हृद्य अवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस तत्-क्षणात
“सभी धार्मिक गतिविधियों को पूरी तरह से त्याग देना जो भौतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं, यह भागवत पुराण सर्वोच्च सत्य का प्रतिपादन करता है, जिसे उन भक्तों द्वारा समझा जा सकता है जो हृदय से पूरी तरह से पवित्र हैं। सर्वोच्च सत्य भ्रम से अलग वास्तविकता है सभी के कल्याण के लिए। ऐसा सत्य त्रिविध कष्टों को जड़ से उखाड़ता है। महामुनि श्री व्यासदेव द्वारा संकलित यह सुंदर भागवत ईश्वर साक्षात्कार के लिए अपने आप में पर्याप्त है। किसी अन्य शास्त्र की क्या आवश्यकता है? जैसे ही कोई भागवत के संदेश को ध्यान से और विनम्रतापूर्वक सुनता है, ज्ञान की इस संस्कृति के द्वारा सर्वोच्च भगवान उनके हृदय में स्थापित हो जाते हैं।” श्रीमद्-भागवतम् का यह श्लोक धर्म, अर्थ, काम और यहाँ तक कि मोक्ष, या मुक्ति सहित भौतिकवादी लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाने वाली सभी धार्मिक गतिविधियों को छलपूर्ण प्रक्रियाओं के रूप में अस्वीकार करता है।
श्रीधर स्वामी के अनुसार, भौतिक अस्तित्व में रहने वालों के द्वारा सफलता (मोक्ष, या मुक्ति) की भौतिक अवधारणा को वांछित माना जाता है। हालाँकि, भक्त, भौतिक अस्तित्व में स्थित नहीं होते हैं, उनमें मुक्ति की कोई इच्छा नहीं होती है।
एक भक्त जीवन के सभी चरणों में हमेशा मुक्त होता है क्योंकि वह हमेशा भक्ति सेवा की नौ वस्तुओं (श्रवण, कीर्तन, आदि) में लगा रहता है। श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन यह मानता है कि कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा हमेशा हर किसी के हृदय में विद्यमान रहती है। इसे बस श्रवणं कीर्तनं विष्णो: की प्रक्रिया द्वारा जागृत किया जाना है। श्रवणाऽऽदि शुद्ध-चित्ते करये उद्धय (चैतन्य चरितामृत मध्य लीला 22.107)। जब कोई वास्तव में भक्ति सेवा में लगा रहता है, तो भगवान के साथ उसका शाश्वत संबंध, सेवक-स्वामी का संबंध जागृत होता है।
