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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 261
 
 
श्लोक  2.9.261 
श्रवण - कीर्तन हइते कृष्णे हय ‘प्रेमा’ ।
सेइ पञ्चम पुरुषार्थ - पुरुषार्थेर सीमा ॥261॥
 
 
अनुवाद
“जब कोई व्यक्ति श्रवण और कीर्तन से प्रारम्भ करके इन नौ प्रक्रियाओं को निष्पादित करके भगवान कृष्ण की प्रेममयी सेवा के स्तर पर पहुँचता है, तो वह सफलता के पाँचवें स्तर और जीवन के लक्ष्यों की सीमा को प्राप्त कर लेता है।
 
“When a person lovingly serves Krishna through these nine methods, beginning with hearing and chanting, he attains the fifth stage of perfection and the limit of the goal of life.”
तात्पर्य
धर्म, आर्थिक उन्नति, इंद्रियतृप्ति और अंतत: ब्रह्म के साथ अभिन्नता की प्राप्ति की इच्छा सभी को होती है। ये सामान्य मनुष्यों की सामान्य प्रक्रियाएँ हैं, परंतु वेदों के कड़े सिद्धांतों के अनुसार सर्वोच्च प्राप्ति श्रवणं कीर्तनम अर्थात भगवान सर्वोच्च पुरुषोत्तम के बारे में सुनने व उनका गायन करने के स्तर तक पहुँचना है। श्रीमद्-भागवतम में (1.1.2) इसकी पुष्टि की गई है:

धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सताम्

 वेद्यं वास्तवं अत्र वस्तु शिव-दं ताप-त्रयोन्मूलनम

श्रीमद्-भागवते महा-मुनि-कृत किं वा परैरीश्वरः

 सद्यो हृद्य अवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस तत्-क्षणात

“सभी धार्मिक गतिविधियों को पूरी तरह से त्याग देना जो भौतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं, यह भागवत पुराण सर्वोच्च सत्य का प्रतिपादन करता है, जिसे उन भक्तों द्वारा समझा जा सकता है जो हृदय से पूरी तरह से पवित्र हैं। सर्वोच्च सत्य भ्रम से अलग वास्तविकता है सभी के कल्याण के लिए। ऐसा सत्य त्रिविध कष्टों को जड़ से उखाड़ता है। महामुनि श्री व्यासदेव द्वारा संकलित यह सुंदर भागवत ईश्वर साक्षात्कार के लिए अपने आप में पर्याप्त है। किसी अन्य शास्त्र की क्या आवश्यकता है? जैसे ही कोई भागवत के संदेश को ध्यान से और विनम्रतापूर्वक सुनता है, ज्ञान की इस संस्कृति के द्वारा सर्वोच्च भगवान उनके हृदय में स्थापित हो जाते हैं।” श्रीमद्-भागवतम् का यह श्लोक धर्म, अर्थ, काम और यहाँ तक कि मोक्ष, या मुक्ति सहित भौतिकवादी लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाने वाली सभी धार्मिक गतिविधियों को छलपूर्ण प्रक्रियाओं के रूप में अस्वीकार करता है।

श्रीधर स्वामी के अनुसार, भौतिक अस्तित्व में रहने वालों के द्वारा सफलता (मोक्ष, या मुक्ति) की भौतिक अवधारणा को वांछित माना जाता है। हालाँकि, भक्त, भौतिक अस्तित्व में स्थित नहीं होते हैं, उनमें मुक्ति की कोई इच्छा नहीं होती है।

एक भक्त जीवन के सभी चरणों में हमेशा मुक्त होता है क्योंकि वह हमेशा भक्ति सेवा की नौ वस्तुओं (श्रवण, कीर्तन, आदि) में लगा रहता है। श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन यह मानता है कि कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा हमेशा हर किसी के हृदय में विद्यमान रहती है। इसे बस श्रवणं कीर्तनं विष्णो: की प्रक्रिया द्वारा जागृत किया जाना है। श्रवणाऽऽदि शुद्ध-चित्ते करये उद्धय (चैतन्य चरितामृत मध्य लीला 22.107)। जब कोई वास्तव में भक्ति सेवा में लगा रहता है, तो भगवान के साथ उसका शाश्वत संबंध, सेवक-स्वामी का संबंध जागृत होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)