प्रभु कहे, - शास्त्रे कहे श्रवण - कीर्तन ।
कृष्ण - प्रेम - सेवा - फलेर ‘परम - साधन’ ॥258॥
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अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "शास्त्रों के अनुसार, श्रवण और कीर्तन की प्रक्रिया कृष्ण की प्रेममयी सेवा प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है।
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “According to the conclusions of the scriptures, the best means to attain loving devotional service to Krishna are hearing and chanting.”
तात्पर्य
तत्त्ववादियों के अनुसार, जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने की श्रेष्ठ प्रक्रिया चारों वर्णों और आश्रमों के कर्तव्यों का पालन करना है। भौतिक संसार में, जब तक कोई किसी एक वर्ण में स्थित न हो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र), सामाजिक मामलों का समुचित प्रबंधन करके सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) के सिद्धांतों का भी पालन करना पड़ता है क्योंकि सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इन सिद्धांतों को आवश्यक माना जाता है। इस तरह तत्त्ववादी यह स्थापित करते हैं कि कृष्ण की खातिर वर्ण और आश्रम के सिद्धांतों का पालन करना सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त करने का श्रेष्ठ मार्ग है। तत्त्ववादियों ने इस प्रकार अपने सिद्धांतों को मानव समाज की दृष्टि से स्थापित किया। श्री चैतन्य महाप्रभु ने, हालाँकि, भिन्न मत व्यक्त करते हुए कहा कि भगवान विष्णु के बारे में सुनना और उनका जप करना श्रेष्ठ प्रक्रिया है। तत्त्ववादियों के अनुसार सर्वोच्च लक्ष्य अपने घर, भगवद् धाम की ओर वापस लौटना है, किंतु श्री चैतन्य महाप्रभु के मत से सर्वोच्च लक्ष्य भगवद् प्रेम को प्राप्त करना है, चाहे वह भौतिक जगत में हो या आध्यात्मिक जगत में। भौतिक जगत में इसका अभ्यास शास्त्रों की आज्ञा के अनुसार किया जाता है और आध्यात्मिक जगत में वस्तविक उपलब्धि पहले से ही मौजूद है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥