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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  2.9.195 
विश्वास करह तुमि आमार वचने ।
पुनरपि कु - भावना ना करिह मने ॥195॥
 
 
अनुवाद
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्राह्मण को आश्वासन दिया, "मेरे वचनों पर विश्वास रखो और इस भ्रांति से अपने मन को और अधिक बोझिल मत बनाओ।"
 
Then Sri Chaitanya Mahaprabhu reassured the brahmin, “Have faith in my words, and do not burden your mind with this ill-feeling.”
तात्पर्य
यह आध्यात्मिक समझ की प्रक्रिया है। अतिच्य: खलु ये भावा ना तान् तर्केन योजयेट:"हमें अपनी भौतिक अवधारणा से परे चीजों को तर्क और प्रतिवाद से समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।" महाजनो येन गताः स पन्थाः:"हमें परम्परा प्रणाली में आने वाले महान अधिकारियों के पदचिन्हों का अनुसरण करना है।" यदि हम एक ईमानदार आचार्य के पास जाते हैं और उनके शब्दों पर विश्वास रखते हैं, तो आध्यात्मिक बोध आसान हो जाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)