न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैैनम
हृदा मनीषामनसाभिक्लृप्तो
य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा
"आत्मा भौतिक आँखों, शब्दों या मन के अधीन नहीं है।"
इसी तरह, श्रीमद् भागवतम् (१०.८४.१३) में कहा गया है:
यस्यात्मा-बुद्धीः कुणपे त्रि-धातुके
स्व-धीः कलत्रादिषु भौम इज्य-धीः
यत् तीर्थ-बुद्धीः सलिलै न करहिच्ज
जनैष्वभिज्ञेषु स एव गो-खरः
कैसा वह मनुष्य है जो अपने शरीर को - जो मात्र तीन तत्वों से बना है - अपनी आत्मा माने, अपने शरीर-जन्य कर्मों को अपने संबंधी माने, अपनी जन्म-भूमि को ही पूजनीय माने, और तीर्थ-यात्रा को केवल स्नान करने तक सीमित समझता हो, पर वहाँ ज्ञानवानों से मिलने न जाए - वह तो गाय या गधे के समान है।"
ये आध्यात्मिक सार के बारे में कुछ वैदिक कथन हैं। आध्यात्मिक सार को अज्ञानी लोग नहीं देख सकते क्योंकि उनमें आत्मा को देखने की दृष्टि या मानसिकता नहीं है। इसलिए वे सोचते हैं कि आत्मा जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं। लेकिन वैदिक आदेशों के अनुयायी अपनी जानकारी वैदिक कथनों से लेते हैं, जैसे ऊपर उद्धृत कठोपनिषद और श्रीमद् भागवतम् के श्लोक।
