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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  2.9.158 
अगाध ईश्वर - लीला किछुइ ना जानि ।
तुमि येइ कह, सेइ सत्य क रि’ मानि ॥158॥
 
 
अनुवाद
"भगवान की दिव्य लीलाएँ अथाह हैं, और मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं जानता। आप जो कुछ भी कहते हैं, मैं उसे सत्य मानता हूँ।"
 
"The Lord's pastimes are unfathomable, and I know nothing about them. Whatever you say, I accept it as truth."
तात्पर्य
यह सर्वोच्च ईश्वर के व्यक्तित्व के बारे में सत्य को समझने का मार्ग है। भगवद् गीता को सुनने के बाद, अर्जुन ने बहुत कुछ वैसा ही कहा था:

सर्वम् एतद ऋतं मन्ये यत् माँ वदसि केशव

न हि ते भगवन व्यक्तिम विदुर देवा न दानवाः

"हे कृष्ण, मैंने जो कुछ भी आपने मुझे बताया है, मैं उसे पूरी तरह से सत्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। हे भगवान, न तो देवता और न ही राक्षस, आपके व्यक्तित्व को समझ सकते हैं।" (बगवद गीता 10.14)

केवल अपने तर्क, बहस और अकादमिक शिक्षा का उपयोग करके भगवान के लीलाओं के बारे में सच्चाई को समझना संभव नहीं है। हमें सर्वोच्च ईश्वर से वास्तविक जानकारी प्राप्त करनी चाहिए, जैसे अर्जुन को तब जानकारी मिली थी जब कृष्ण ने भगवद् गीता का उपदेश दिया था। हमें भगवद् गीता या किसी भी अन्य वैदिक साहित्य को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना होगा। ये वैदिक साहित्य भगवान के बारे में ज्ञान का एकमात्र स्रोत हैं। हमें समझना चाहिए कि हम केवल सैद्धांतिक प्रक्रिया द्वारा पूर्ण सत्य को समझ नहीं सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)