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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 155
 
 
श्लोक  2.9.155 
एक ईश्वर - भक्तेर ध्यान - अनुरूप ।
एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप ॥155॥
 
 
अनुवाद
"भगवान के दिव्य रूपों में कोई अंतर नहीं है। विभिन्न भक्तों की विभिन्न आसक्तियों के कारण उनके विभिन्न रूप प्रकट होते हैं। वास्तव में भगवान एक ही हैं, किन्तु वे अपने भक्तों को संतुष्ट करने के लिए विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं।"
 
"There is no difference between the divine forms of the Lord. Different forms appear due to the different devotions of different devotees. In reality, the Lord is one, but He appears in various forms to satisfy His devotees."
तात्पर्य
ब्रह्म संहिता (5.33) में कहा गया है:

अद्वैतम् अच्युतम् अनादि अनन्त-रूपम्

आद्यम् पुराण-पुरुषं नव-यौवनं च

भगवान अद्वैत हैं, जिसमें भेद नहीं होता। कृष्ण, राम, नारायण और विष्णु के स्वरूप में कोई अंतर नहीं है। ये सभी एक है। कभी-कभी मूर्ख लोग पूछते हैं कि क्या जब हम हरे कृष्ण मंत्र में "राम" का उच्चारण करते हैं तो हमारा तात्पर्य भगवान रामचंद्र या भगवान बलराम से है। यदि कोई भक्त कहता है कि हरे कृष्ण महा-मंत्र में राम नाम का उल्लेख बलराम से है, तो एक मूर्ख व्यक्ति क्रोधित हो सकता है क्योंकि उसके लिए राम नाम भगवान रामचंद्र को संदर्भित करता है। वास्तव में, बलराम और भगवान राम में कोई अंतर नहीं है। हरे राम का उच्चारण करते समय किसी का बलराम या भगवान रामचंद्र को संदर्भित करना महत्व नहीं रखता, क्योंकि दोनों में कोई अंतर नहीं है। हालांकि, यह सोचना आपत्तिजनक है कि बलराम भगवान रामचंद्र से श्रेष्ठ हैं या इसके विपरीत। नवोदित भक्त इस शास्त्रीय निष्कर्ष को नहीं समझते हैं, और परिणामस्वरूप वे अनावश्यक रूप से एक आपत्तिजनक स्थिति पैदा करते हैं। पाठ 154 में श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसे बहुत स्पष्ट तरीके से स्पष्ट किया: ईश्वरत्वे भेद मानिले हय अपराध। "भगवान के स्वरूपों के बीच अंतर करना अपराध है।" दूसरी ओर, किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान के रूप देवताओं के रूपों के समान हैं। यह निश्चित रूप से आक्रामक है, जैसा कि वैष्णव-तंत्र द्वारा पुष्टि की गई है:

यस्तु नारायणं देवम् ब्रह्म-रुद्रादि-दैवतैः

समत्वेनैव वीक्षेत स पाषंडी भवेत् ध्रुवम

"एक पाषंडी वह है जो भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे महान देवताओं को भगवान, नारायण के समान मानता है।" (हरि-भक्ति-विलास 7.117)

निष्कर्ष यह है कि हमें न तो भगवान के रूपों में अंतर करना चाहिए और न ही भगवान के रूपों की देवताओं या मनुष्यों के रूपों से बराबरी करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, कभी-कभी मूर्ख संन्यासी लोग भगवान के शरीर को भौतिक मानते हुए, दारिद्र-नारायण को नारायण के समान मानते हैं, और यह निश्चित रूप से अपमानजनक है। जब तक किसी को एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु द्वारा निर्देशित नहीं किया जाता है, वह इन विभिन्न रूपों को पूरी तरह से समझ नहीं सकता है। ब्रह्म-संहिता पुष्टि करती है, वेदेषु दुर्लभम अदुर्लभम आत्म-भक्तौ। एक व्यक्ति विद्वतापूर्ण अध्ययन या वैदिक साहित्य को पढ़कर भगवान के रूपों के बीच के अंतर को नहीं समझ सकता है। व्यक्ति को किसी अनुभवी भक्त से सीखना चाहिए। तभी वह भगवान के एक रूप और दूसरे रूप में अंतर करना सीख सकता है। निष्कर्ष यह है कि भगवान के रूपों में कोई अंतर नहीं है, लेकिन उनके स्वरूपों और देवताओं के रूपों में अंतर है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)