श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  2.9.147 
स्वयं भगवान् कृष्ण हरे लक्ष्मीर मन ।
गोपिकार मन हरिते नारे ‘नाराय ण’ ॥147॥
 
 
अनुवाद
"भगवान कृष्ण लक्ष्मीजी के मन को आकर्षित करते हैं, किन्तु भगवान नारायण गोपियों के मन को आकर्षित नहीं कर सकते। इससे कृष्ण की श्रेष्ठता सिद्ध होती है।"
 
"The Supreme Personality of Godhead, Krishna, captivates the heart of Lakshmi, but Lord Narayana fails to captivate the hearts of the gopis. This proves Krishna's superiority."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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