सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश - कृष्ण - स्वरूपयोः ।
रसेनोत्कृष्यते कृष्ण - रूपमेषा रस - स्थितिः ॥146॥
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अनुवाद
दिव्य अनुभूति के अनुसार, कृष्ण और नारायण के स्वरूपों में कोई अंतर नहीं है। फिर भी, कृष्ण में दाम्पत्य-मैथुन के कारण एक विशेष दिव्य आकर्षण है, और फलस्वरूप वे नारायण से भी श्रेष्ठ हैं। यही दिव्य-मैथुन का निष्कर्ष है।
"According to divine experience, there is no difference between the forms of Krishna and Narayana. Yet, due to the sweetness of Krishna, there is a special divine attraction. Consequently, He is superior to Narayana. This is the conclusion of the divine emotions."
तात्पर्य
यह "भक्ति-रसामृत-सिंधु" (1.2.59) का एक छंद है| यहॉं श्रील कृष्णदास कविराज यह कहते हैं कि भगवान चैतन्य ने यह छंद वेंकट भट्ट से कहा था, और इसके पहले उन्होंने यह कहा था कि वेंकट भट्ट ने यह भगवान से कहा था| लेकिन चूँकि उनकी बातचीत "भक्ति-रसामृत-सिंधु" की रचना से बहुत पहले हुई थी, प्रश्न उठता है कि उन्होंने किस प्रकार उस छंद का उल्लेख किया| श्रील भक्ति विनोद ठाकुर बताते हैं कि इस छंद और इस तरह के कई अन्य छंद भक्तों के बीच "भक्ति-रसामृत-सिंधु" की रचना से पहले से ही प्रसिद्ध थे| इस प्रकार भक्त हमेशा उनका उल्लेख करते थे और उनके भावों की व्याख्या परमानंद में करते थे|
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥