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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.9.14 
एइ श्लोक पथे प ड़ि’ करिला प्रयाण ।
गौतमी - गङ्गाय याइ’ कैल गङ्गा - स्नान ॥14॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु मार्ग में चलते हुए इस रामराघव मंत्र का जप करते थे। इस प्रकार जप करते हुए, वे गौतमी गंगा के तट पर पहुँचे और वहाँ स्नान किया।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu chanted this same Rama Raghava mantra while on his way. Chanting this mantra, he reached the banks of the Gautami Ganga and bathed there.
तात्पर्य
गोदावरी नदी की एक शाखा गौतमीगंगा है। प्राचीन काल में गौतम ऋषि नामक एक महान ऋषि राजमुंद्री शहर के सामने इस नदी के तट पर रहते थे, जिसके कारण इस नदी की इस शाखा को गौतमीगंगा कहा गया।

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि श्रील कावीराज गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा देखे गए पवित्र स्थानों के नाम दर्ज किए हैं लेकिन उन स्थानों को कालानुक्रमिक क्रम में नहीं रखा। हालाँकि गोविंद दास की एक पुस्तिका है जिसमें कालानुक्रमिक क्रम और भौगोलिक स्थिति के संदर्भ हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर पाठकों से उस पुस्तक को देखने का आग्रह करते हैं। गोविंद दास के अनुसार श्री चैतन्य महाप्रभु गौतमीगंगा से त्रिमंद्र गए। वहाँ से वो धुंडीराम-तीर्थ गए जो की एक अन्य तीर्थ स्थल है। श्री चैतन्य-चरितामृता के अनुसार गौतमीगंगा के दर्शन के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु मल्लिकार्जुन-तीर्थ गए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)