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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.9.137 
अन्य देहे ना पाइये रास - विलास ।
अतएव ‘नायं’ श्लोक कहे वेद - व्यास ॥137॥
 
 
अनुवाद
“वैदिक साहित्य के सर्वोच्च विद्वान व्यासदेव ने ‘नायां सुखपो भगवान्’ से प्रारम्भ होने वाले श्लोक की रचना की, क्योंकि गोपी के अतिरिक्त किसी अन्य शरीर में कोई भी रास-लीला नृत्य में प्रवेश नहीं कर सकता।”
 
“Vyasadeva, the supreme authority on Vedic literature, composed the verse beginning with Nayam Sukhapo Bhagavan, because a person cannot enter into the Raas Leela dance in any other body except the bodies of the Gopis.”
तात्पर्य
इस श्लोक से भगवद्गीता (९.२५) के एक श्लोक की पुष्टि होती है:

यांति देवव्रता देवान्पितॄन्यांति पितृव्रताः

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्-याजिनो ऽपि माम्

भगवान कृष्ण ने कहा, ``जो देवताओं की पूजा करता है, वह देवताओं की कोख से जन्म लेगा, जो पितरों की पूजा करता है, वह पितरों के लोक में जाएगा, जो भूत-प्रेत की पूजा करता है, वह भूत-प्रेत में जन्म लेगा और जो मेरी पूजा करता है, वह मेरे साथ रहेगा।''

भौतिक सृष्टि में, प्रत्येक बद्ध जीव बार-बार अपने भौतिक शरीर को त्यागता है, लेकिन जब आत्मा भौतिक आवरणों से शुद्ध हो जाती है, तो उसके लिए फिर से भौतिक शरीर धारण करने की कोई संभावना नहीं रहती। ऐसी आत्मा अपनी मूल, आध्यात्मिक पहचान में रहती है, जो अवस्था कृष्ण चेतना के अभ्यास द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। जैसा कि भगवद्गीता (४.९) में कृष्ण कहते हैं,

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सो ऽर्जुन।।

``जो मेरे अवतार और कर्मों की पारलौकिक प्रकृति को तत्वतः जानता है, वह शरीर त्यागने पर पुनः इस भौतिक जगत् में जन्म नहीं लेता, लेकिन हे अर्जुन, वह मेरे शाश्वत निवास में पहुँचता है।''

केवल तभी जब कोई अपने मूल आध्यात्मिक शरीर को प्राप्त कर लेता है तभी वह आध्यात्मिक राज्य में प्रवेश कर सकता है। जहाँ तक भगवान के रासलीला विलासों का संबंध है, भौतिक जगत् में रहने वाले के लिए भगवान के नृत्यों की नकल करने का प्रयास व्यर्थ है। रासलीला के विलासों में प्रवेश करने के लिए गापी के समान आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करना होता है। नायं सुखापो श्लोक में, भक्तों को भक्तिमत् कहा गया है, अर्थात पूर्ण रूप से भक्ति सेवा में लीन हैं और भौतिक संदूषण से रहित हैं। कोई कृष्ण के रासलीला नृत्य में केवल कृत्रिम रूप से उसकी नकल करके या कृत्रिम रूप से खुद को सखी मानकर और उसके जैसा वस्त्र पहनकर प्रवेश नहीं कर सकता। कृष्ण का रासलीला नृत्य पूर्णतः आध्यात्मिक है; इसका भौतिक संदूषण से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए कोई भी कृत्रिम, भौतिक साधनों से इस विलास में प्रवेश नहीं कर सकता। यह नायं सुखापो श्लोक का निर्देश है, और इसे सख्ती से समझा जाना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)