व्रज - लोकेर भावे येइ करये भजन ।
सेइ जन पाय व्रजे व्रजेन्द्र - नन्दन ॥131॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
"जो व्यक्ति व्रजभूमि के निवासियों के पदचिन्हों पर चलकर भगवान की पूजा करता है, वह उन्हें व्रज के दिव्य लोक में प्राप्त करता है, जहाँ वे महाराज नन्द के पुत्र के रूप में जाने जाते हैं।"
"One who follows the footsteps of the inhabitants of Vrajabhumi attains the Lord in the transcendental world of Vraja. There He is known as the son of Maharaja Nanda."
तात्पर्य
वृजभूमि या गोलोक वृंदावन के निवासी कृष्ण को महाराजा नंद के पुत्र के रूप में जानते हैं। वे उन्हें भगवान नहीं मानते, जैसा कि सामान्य लोग उन्हें मानते हैं। भगवान सभी के श्रेष्ठ पालनहार हैं और सभी व्यक्तियों में प्रमुख व्यक्तित्व हैं। वृजभूमि में निश्चित रूप से कृष्ण प्रेम के केंद्र हैं, लेकिन वहाँ कोई भी उन्हें भगवान के रूप में नहीं जानता। बल्कि, कोई उन्हें मित्र, पुत्र, प्रेमी या स्वामी के रूप में जान सकता है। किसी भी स्थिति में, केंद्र कृष्ण है। वृजभूमि के निवासी भगवान से दासता, मित्रता, माता-पिता के प्रेम और दांपत्य प्रेम से संबंधित हैं। भक्ति सेवा में निरत व्यक्ति इनमें से किसी भी एक दिव्य संबंध को स्वीकार कर सकता है, जिसे रस के रूप में जाना जाता है। जब ऐसा व्यक्ति पूर्णता की अवस्था तक पहुँचता है, तो वह अपनी शुद्ध आध्यात्मिक पहचान के साथ कृष्ण के पास घर लौट आता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥