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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  2.9.126 
तुमि साक्षात्सेइ कृष्ण, जान निज - कर्म ।
यारे जानाह, सेइ जाने तोमार लीला - मर्म ॥126॥
 
 
अनुवाद
"आप स्वयं भगवान कृष्ण हैं। आप अपने कार्यों का तात्पर्य जानते हैं, और जिस व्यक्ति को आप ज्ञान देते हैं, वह आपकी लीलाओं को भी समझ सकता है।"
 
"You are the Supreme Personality of Godhead, Krishna. Only You understand the purpose of Your actions, or anyone to whom You impart this knowledge can understand Your pastimes."
तात्पर्य
आध्यात्मिक व्यक्तित्व भगवान कृष्ण और उनके लीलाओं को की समझ भौतिक इंद्रियों द्वारा नहीं की जा सकती। प्रभु को सेवा करने से ही इंद्रियों का शोधन होता है। जब प्रभु प्रसन्न होते हैं और खुद को प्रकट करते हैं, तो ही आप प्रभु के पारलौकिक रूप, नाम, गुणों और लीलाओं की समझ प्राप्त कर सकते हैं। यह कथ उपनिषद (2.23) और मुंडक उपनिषद (3.2.3) में पुष्टि की गई है: "यम एवैषा वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वां।' "जो भी परम व्यक्तित्व भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करता है, वह उनके पारलौकिक नाम, गुण, रूप और लीलाओं को समझ सकता है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)