श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  2.9.119 
विनोदिनी लक्ष्मीर हय कृष्णे अभिलाष ।
इहाते कि दोष, केने कर परिहास ॥119॥
 
 
अनुवाद
वेंकट भट्ट ने आगे समझाया, "लक्ष्मी माता लक्ष्मी भी दिव्य आनंद की भोक्ता हैं; इसलिए यदि वे कृष्ण के साथ आनंद लेना चाहती थीं, तो इसमें क्या दोष है? आप इस विषय में इतना मज़ाक क्यों कर रहे हैं?"
 
Venkata Bhatta continued, "Mother Lakshmi is also a enjoyer of transcendental bliss, so if she wanted to enjoy sex with Krishna, what's wrong with that? Why are you making fun of it?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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