Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
"चूँकि कृष्ण और नारायण एक ही व्यक्तित्व हैं, इसलिए लक्ष्मी का कृष्ण के साथ संबंध उनके सतीत्व व्रत को भंग नहीं करता। बल्कि, यह तो बड़े मजे की बात थी कि लक्ष्मी भगवान कृष्ण के साथ संबंध बनाना चाहती थीं।"
"Since Krishna and Narayana are one and the same person, Lakshmi's association with Krishna does not violate her duty as a wife. Rather, it was a matter of great joy that Lakshmiji chose to be with Lord Krishna."
तात्पर्य
यह भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रश्न का उत्तर है और इससे हम समझ सकते हैं कि वेङ्कट भट्ट सच्चाई जानते थे। उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को बताया कि नारायण कृष्ण का एक रूप है जो अलौकिक ऐश्वर्य से जुड़ा है। यद्यपि कृष्ण द्विभुज हैं और नारायण चतुर्भुज हैं, किन्तु व्यक्ति में कोई भेद नहीं है। वे एक और एक ही हैं। नारायण कृष्ण के समान सुन्दर हैं, किन्तु कृष्ण के लीलाएँ अधिक क्रीड़ा-पूर्ण हैं। ऐसा नहीं है कि कृष्ण की क्रीड़ा-पूर्ण लीलाएँ उन्हें नारायण से भिन्न बनाती हैं। लक्ष्मी का कृष्ण के साथ मिलने की इच्छा करना बिल्कुल स्वाभाविक था। दूसरे शब्दों में, यह समझने योग्य है कि एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ उसके सभी भिन्न प्रकार के वस्त्रों में मिलना चाहती है। इसलिए लक्ष्मी की कृष्ण के साथ मिलने की इच्छा करने के लिए उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥