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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.9.1 
नाना - मत - ग्राह - ग्रस्तान्दाक्षिणात्य - जन - द्विपान् ।
कृपारिणा विमुच्यैतागौरश्चक्रे स वैष्णवान् ॥1॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने दक्षिण भारत के निवासियों का धर्म परिवर्तन किया। ये लोग हाथी के समान बलवान थे, किन्तु बौद्ध, जैन और मायावादी दर्शनों जैसे विभिन्न दर्शनों के मगरमच्छों के चंगुल में फँसे हुए थे। अपनी कृपा के चक्र से भगवान ने उन सभी को वैष्णव, अर्थात् भगवान के भक्त बनाकर उनका उद्धार किया।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu transformed the hearts of the people of South India. These people were as strong as elephants, yet they were trapped in the clutches of crocodiles in the form of various ideologies—Buddhist, Jain, and Mayavadi philosophies. With the discus of his grace, Mahaprabhu liberated everyone by transforming them into Vaishnavas, meaning devotees of God.
तात्पर्य

यहाँ भगवान विष्णु द्वारा गजेंद्र हाथी को मगरमच्छ के हमले से बचाने की तुलना श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दक्षिण भारत के लोगों को वैष्णवों में बदलने से की गई है। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने दक्षिण भारत का दौरा किया, तो लगभग सभी निवासी बौद्ध, जैन और मायावादी दर्शन के मगरमच्छों के जबड़ों में थे। यहाँ कविराज गोस्वामी कहते हैं कि हालाँकि ये लोग हाथियों की तरह मज़बूत थे, परन्तु वे लगभग मृत्यु के चंगुल में थे क्योंकि उन पर विभिन्न दर्शनों के मगरमच्छों द्वारा हमला किया जा रहा था। हालाँकि, जिस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने विष्णु के रूप में हाथी गजेंद्र को एक मगरमच्छ के चंगुल से बचाया था, उसी तरह उन्होंने दक्षिण भारत के सभी लोगों को विभिन्न दर्शनों के चंगुल से उन्हें वैष्णवों में बदलकर बचाया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)