श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  2.8.92 
एइ ‘प्रेमे’र अनुरूप ना पारे भजिते ।
अतएव ‘ऋणी’ हय - कहे भागवते ॥92॥
 
 
अनुवाद
श्रीमद्भागवतम् (10.32.22) में कहा गया है कि भगवान कृष्ण माधुर्य रस में भक्ति का उचित प्रतिदान नहीं कर सकते; इसलिए वे ऐसे भक्तों के सदैव ऋणी रहते हैं।
 
“It is said in Srimad Bhagavatam (10.32.22) that Lord Krishna is unable to reciprocate devotion in the sweet rasa in equal proportion, hence He is always indebted to such devotees.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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