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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  2.8.89 
मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते ।
दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥89॥
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण ने गोपियों से कहा, 'मेरी कृपा प्राप्त करने का साधन मेरी प्रेममयी सेवा है, और सौभाग्य से तुम सभी इसी में लगी हुई हो। जो जीव मेरी सेवा करते हैं, वे वैकुण्ठलोक में जाने और ज्ञान एवं आनंद सहित शाश्वत जीवन प्राप्त करने के पात्र हैं।'
 
“Lord Krishna said to the gopis, ‘The means to obtain my grace is my loving service, and fortunately, you are all engaged in that. Those who serve me are worthy of going to Vaikuntha and attaining eternal life full of knowledge and bliss.’
तात्पर्य
श्रीमद् -भागवतम (१०.८२.४४) के इस श्लोक में मानव के जीवन की पूर्णता का सारांश है। इस श्लोक में दो महत्वपूर्ण शब्द हैं: भक्ति (निष्ठा पूर्वक सेवा) और अमृत्वा (शाश्वत जीवन)। मानव जीवन का लक्ष्य शाश्वत जीवन की स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त करना है। इस शाश्वत जीवन को केवल निष्ठापूर्वक सेवा से ही प्राप्त किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)