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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  2.8.84 
यथोत्तरमसौ स्वाद - विशेषोल्लास - मय्यपि ।
रतिर्वासनया स्वाद्वी भासते कापि कस्यचित् ॥84॥
 
 
अनुवाद
"बढ़ते हुए प्रेम का अनुभव विभिन्न रुचियों में होता है, एक के ऊपर एक। लेकिन वह प्रेम जो इच्छाओं के क्रमिक क्रम में सर्वोच्च स्वाद रखता है, वह दाम्पत्य प्रेम के रूप में प्रकट होता है।"
 
"In each successive rasas, we experience more and more love. But the highest-tasting love is revealed only in the madhurya rasa."
तात्पर्य
यह पद श्रील रूप गोस्वामी के भक्तिरसामृतसिंधु (२.५.३८) का है, और आदि-लीला, अध्याय चार, श्लोक 45।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)