श्रुति-स्मृति-पुराणाधि- पंचरात्र-विधिं बिना
एकांतिकी हररे भक्ति उत्पातायेव कल्पते
वह इस श्लोक में स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हैं कि व्यक्ति को वैदिक साहित्य और अन्य, पूरक साहित्य का उल्लेख करना चाहिए और वेदों के निष्कर्ष का पालन करना चाहिए। एक आविष्कृत भक्ति भावना केवल पारलौकिक क्षेत्र में अशांति पैदा करती है। यदि कोई व्यक्ति परिवार के जीवन का अत्यधिक आदी हो तो आजीविका कमाने के लिए श्रीमद-भागवतम या कृष्ण चेतना लेता है, तो उसकी गतिविधि निश्चित रूप से आपत्तिजनक होती है। व्यक्ति को जाति गुरु नहीं बनना चाहिए और सांसारिक ग्राहकों के लाभ के लिए मंत्र नहीं बेचना चाहिए, न ही उसे आजीविका के लिए शिष्य बनाना चाहिए। ये सभी गतिविधियाँ आपत्तिजनक हैं। व्यक्ति को मण्डलीय जप करने के लिए एक पेशेवर बैंड बनाकर आजीविका नहीं बनानी चाहिए, न ही जब व्यक्ति सांसारिक समाज, मित्रता और प्रेम से जुड़ा हो, तो भक्ति सेवा करनी चाहिए। न ही सामाजिक शिष्टाचार पर निर्भर होना चाहिए। यह सब मानसिक अटकलें हैं। इनमें से किसी भी चीज़ की तुलना अमूल्य भक्ति सेवा से नहीं की जा सकती है। कोई भी अमूल्य भक्ति सेवा, कृष्ण चेतना की तुलना सांसारिक गतिविधियों से नहीं कर सकता है। श्री चैतन्य पंथ से संबंधित होने के नाते कई अनधिकृत पक्ष हैं, और कुछ औला, बौला, कर्ताभजा, नेदा, दारावेशा, सांगी, सहजिया सखीभेकी, स्मार्ट, जता-गोसांगी, अतिवादी, चुडाधारी और गौरांग-नागरी के रूप में जाने जाते हैं।
इसके अलावा, ऐसे लोग भी हैं जो ऐसे दलों के बारे में जाति के गोस्वामियों की राय को प्रमाणिक मानते हैं, इन विचारों की तुलना श्री रूप और श्री सनातन के नेतृत्व में छह गोस्वामी लोगों की राय से करते हैं। यह केवल एक और धोखा प्रक्रिया है। ऐसे भी होते हैं जो अनधिकृत गाने बनाते हैं, जो पैसे के लिए अलग-अलग मंदिर स्थापित करते हैं, जो वेतन के लिए पुजारी के रूप में देवता की पूजा करते हैं, जो जाति के ब्राह्मणवाद को स्वीकार करते हैं, और जो शुद्ध वैष्णव के मूल्य को नहीं जानते हैं। वास्तव में स्मार्ट समुदाय के जाति ब्राह्मण सत्वत-पंचरात्र के सिद्धांतों के विपरीत हैं। इसके अलावा, कई मायावादी और भौतिक भावना के आनंद के लिए अत्यधिक आदी हैं। इनमें से किसी की तुलना उस व्यक्ति से नहीं की जा सकती जो कृष्ण चेतना के प्रचार में विशुद्ध रूप से व्यस्त है। प्रत्येक कृष्ण चेतना व्यक्ति लगातार भगवान की सेवा में विभिन्न पारलौकिक उपकरणों का उपयोग करने का प्रयास कर रहा है। ऐसा भक्त सभी भौतिक आनंद को त्याग देता है और खुद को अपने आध्यात्मिक गुरु और भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में पूरी तरह से समर्पित कर देता है। वह एक पूर्ण ब्रह्मचारी, एक संयमित गृहस्थ, एक विनियमित वानप्रस्थ या त्यागी आदेश में त्रिदंडी-संन्यासी हो सकता है। कोई बात नहीं। छद्म पारलौकिकतावादियों और शुद्ध भक्तों की तुलना नहीं की जा सकती है, न ही कोई यह तर्क दे सकता है कि व्यक्ति पूजा का अपना तरीका खुद ही ईजाद कर सकता है।
इस श्लोक की व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए दैवी भावों जैसे शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य की तुलनात्मक स्थितियों को समझाना आवश्यक है। ये सभी रस या भाव दैवी मंच पर स्थित हैं। शुद्ध भक्त इनमें से किसी एक का आश्रय लेते हैं और इस प्रकार आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ते हैं। वास्तव में कोई ऐसे आध्यात्मिक भावों का आश्रय तभी ले सकता है जब वह भौतिक लगाव से पूरी तरह अप्रभावित हो। जब कोई भौतिक लगाव से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, तो भक्त के हृदय में दैवी भावों की भावना जागृत होती है। वह स्वरूप-सिद्धि है, परम प्रभु के साथ अपने शाश्वत संबंध की पूर्णता। परम प्रभु के साथ शाश्वत संबंध, स्वरूप-सिद्धि किसी भी दैवी भाव में स्थित हो सकती है। उनमें से प्रत्येक उतना ही पूर्ण है जितना कि अन्य। लेकिन तुलनात्मक अध्ययन से एक निष्पक्ष व्यक्ति यह समझ सकता है कि सेवाभाव निष्पक्षता के भाव से बेहतर है, भाईचारे का भाव सेवाभाव से बेहतर है, माता-पिता का भाव भाईचारे से बेहतर है और अन्य सभी भावों से ऊपर संयोगात्मक प्रेम का भाव है। हालाँकि, ये सभी आध्यात्मिक रूप से एक ही मंच पर स्थित हैं क्योंकि प्रेम में पूर्णता के ये सभी रिश्ते एक केंद्रीय बिंदु पर आधारित होते हैं - कृष्ण।
इन भावों की तुलना देवताओं की पूजा से प्राप्त भावनाओं से नहीं की जा सकती। कृष्ण एक हैं, लेकिन देवता अलग-अलग हैं। वे भौतिक हैं। कृष्ण के लिए प्रेम की तुलना विभिन्न देवताओं के लिए भौतिक प्रेम से नहीं की जा सकती। क्योंकि मायावादी भौतिक मंच पर हैं, वे शिव या दुर्गा की पूजा की सिफारिश करते हैं और कहते हैं कि काली और कृष्ण की पूजा एक ही है। हालाँकि, आध्यात्मिक मंच पर कोई देवता पूजा नहीं है। पूजा करने योग्य वस्तु केवल कृष्ण है। इसलिए यद्यपि शांत-रस या दास्य-रस, वात्सल्य-रस या माधुर्य-रस में कोई भक्त के बीच कोई अंतर नहीं है, फिर भी कोई इन विभिन्न दैवी स्थितियों में प्रेम की तीव्रता का तुलनात्मक अध्ययन कर सकता है। उदाहरण के लिए, यह कहा जा सकता है कि दास्य-रस शांत-रस से बेहतर है, फिर भी दोनों में भगवान का दिव्य प्रेम है। इसी तरह, हम यह कह सकते हैं कि भाईचारे में ईश्वर का प्रेम निष्पक्षता और सेवाभाव में ईश्वर के प्रेम से बेहतर है। इसी प्रकार, भाईचारे में ईश्वर का प्रेम माता-पिता के स्नेह में प्रेम से बेहतर है। और, जैसा कि पहले कहा गया है, संयोगात्मक रस में ईश्वर का प्रेम माता-पिता के रस में प्रेम से श्रेष्ठ है।
ईश्वर के विभिन्न प्रकार के प्रेम का विश्लेषण विशेषज्ञ आचार्यों द्वारा किया गया है जो दैवी मंच पर भक्ति सेवा के बारे में सब कुछ जानते हैं। दुर्भाग्य से, सांसारिक दुनिया में अनुभवहीन और अनधिकृत व्यक्ति, शुद्ध प्रेम की दैवी स्थिति को नहीं समझते हुए, दैवी प्रक्रिया में कुछ भौतिक दोष खोजने की कोशिश करते हैं। यह केवल आध्यात्मिक रूप से अनुभवहीन लोगों की ओर से निर्लज्जता है। इस तरह के दोष समस्या को दुर्भाग्यपूर्ण सांसारिक विवादियों के लक्षण हैं।
