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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  2.8.80 
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त - रतेः प्रसादः स्वर्शोषितां नलिन - गन्ध - रुचां कुतोऽन्याः ।
रासोत्सवेऽस्य भुज - दण्ड - गृहीत - कण्ठ - लब्धाशिषां य उदगाव्रज - सुन्दरीणाम् ॥80॥
 
 
अनुवाद
“जब भगवान श्रीकृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नृत्य कर रहे थे, तब भगवान ने गोपियों को अपने गले में बाँहों में भर लिया था। यह दिव्य कृपा लक्ष्मी या आध्यात्मिक जगत की अन्य पत्नियों को कभी प्राप्त नहीं हुई। न ही स्वर्ग की परम सुंदरी कन्याओं ने कभी ऐसी कल्पना की थी, जिनकी शारीरिक कांति और सुगंध कमल पुष्पों के सौंदर्य और सुगंध के समान थी। और सांसारिक स्त्रियों की तो बात ही क्या, जो भौतिक दृष्टि से अत्यंत सुंदर हो सकती हैं?’
 
"When Lord Krishna was dancing the Rasa dance with the Gopis, his arms were embracing them around their necks. Such a divine opportunity was never bestowed upon Lakshmiji, nor upon the other beloveds of Vaikuntha. Nor did the most exalted beauties of heaven, whose bodies radiate and emanate the fragrance of lotus flowers, ever imagine such a thing. So what about earthly women, who are physically so beautiful?"
तात्पर्य
यह श्लोक (भाग. 10.47.60) उद्धव ने तब कहा था जब वे श्री वृंदावन गए थे श्रीकृष्ण का संदेश गोपियों तक पहुंचाने। उद्धव वृंदावन में ही वहां की गोपियों के क्रिया-कलापों को देखने के लिए रुक गए। जब उन्होंने गोपियों के वियोग में श्रीकृष्ण के प्रति उत्कट प्रेम को देखा तो उन्होंने उनके असीम प्रेम को सराहा और इसलिए इस श्लोक में अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने स्वीकार किया कि गोपियों के भाग्य की तुलना भाग्य की देवी के भाग्य से भी नहीं की जा सकती, स्वर्गलोक की सुंदर कन्याओं की बात तो दूर रही।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)