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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  2.8.78 
नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्ग - संश्रया ।
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत्प्राप विमुक्ति - दात् ॥78॥
 
 
अनुवाद
“‘माता यशोदा को मोक्षदाता श्रीकृष्ण से जो कृपा प्राप्त हुई, वह ब्रह्मा या शिवजी को भी नहीं मिली, यहाँ तक कि लक्ष्मी जी को भी नहीं, जो सदैव भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर विराजमान रहती हैं।’”
 
“The grace and blessings that Mother Yashoda received from Lord Krishna, the bestower of salvation, could never be received by Lord Brahma, Lord Shiva, or Goddess Lakshmi who always resides on the chest of Lord Vishnu.”
तात्पर्य
यह श्रीमद्-भागवतम (10.9.20) का एक कथन है। कृष्ण माँ यशोदा द्वारा रस्सियों से बाँधने की कोशिश करने के बाद, उनके द्वारा बंधे जाने के लिए सहमत हुए थे। यह कृष्ण के लीलाओं के वर्णन में महाराजा परीक्षित के समक्ष शुकदेव गोस्वामी द्वारा की गई एक और सराहना है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)