प्रभु कहे, “एहो हय, किछु आगे आर” ।
राय कहे, “सख्य - प्रेम - सर्व - साध्य - सार” ॥74॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
रामानन्द राय की यह बात सुनकर भगवान ने उनसे पुनः एक कदम आगे बढ़ने का अनुरोध किया। उत्तर में, रामानन्द राय ने कहा, "भ्रातृभाव से की गई कृष्ण की प्रेममयी सेवा ही सर्वोच्च सिद्धि है।"
Hearing this from Ramanand Rai, Mahaprabhu again requested him to go further. Ramanand Rai replied, “Loving devotion to Krishna done with the feeling of friendship is the highest perfection.”
तात्पर्य
जबतक गुरु-शिष्य के सम्बन्ध में प्रभु की प्रेममय सेवा की जाती है, तबतक कुछ भय बना रहता है, क्योंकि स्वार्थ की निकटता होने पर भी शिष्य स्वामी से सदैव भयभीत रहता है। इस अवस्था में शिष्य स्वामी का सदैव भय एवं आदर करता है। जब भक्त अधिक उन्नत हो जाता है, तो उसे भय नहीं रहता। वह स्वयं को और प्रभु को एक स्तर का मानता है। इस समय, भक्त को पूर्ण विश्वास हो जाता है कि भगवान कृष्ण मित्र हैं और यदि भक्त उन्हीं के साथ एक स्तर पर रहता है तब भी वह कदापि असंतुष्ट नहीं हो सकते। इस समझ को विश्रम्भ कहा जाता है, अर्थात आदरपूर्ण भावना से रहित। जब यह भाव चुना जाता है, तो यह सख्य-प्रेम बन जाता है, या मित्रता में ईश्वर का प्रेम। इस अवस्था में प्रभु और भक्त के मध्य समानता की भावना विकसित होती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥